मद्धिम उजालों में रात शनै शनै ढलती।
ढिबरी की लौ हवाओं से संभलती रही।
दूर गगन में चाँद शनै शनै बढ़ता चला।
भटकी नींद आँखों में ख्वाब पालती रही।
मध्यम वर्ग की उदास वो खोई सी बस्ती।
अस्तित्व संभाले उम्मीद में मचलती रही।
दूर तारे से टिमटिमाते हुए ख्वाब थे कई।
शिक्षा की चाह वहीं गहरे में दबती रही।
सुरसा-सी बढ़तीं जरूरतें हर पल नई।
सूखते स्रोत,प्यास दिल की सूखती रही।
हाथ खाली, मन भारी, राहें थकीं थकीं।
नज़रें अंधेरों में भी उम्मीदें तलाशती रही।
किस्मत की धूप में हर ख्वाब पिघल रहा।
छाँव सी कोई चाह मन को बहकती रही।
दूर आंखों में खोया हुआ सपनों का शोर।
सूनी आँखे सन्नाटों में मंजर तलाशती रही।
खोयी खोयी नजरें तमस में ज्योति ढूँढती।
उम्मीदों की लौ गहरे दिल में मचलती रही।
एक चिंगारी जो मन में अभी बाकी रही।
ढिबरी जलने का ठाने लौ संभालती रही।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







