जो बहुत अमीर थे,
उन्होंने शहर को एक दुकान की तरह देखा,
और जो सत्ता में थे,
उन्होंने संसद को अपनी रसोई बना लिया।
वे भूल गए कि जब तिजोरियाँ बहुत भारी हो जाती हैं,
तो अक्सर मनुष्य की रीढ़ की हड्डी कमज़ोर पड़ जाती है।
यह कोई महायुद्ध नहीं, एक धीमा और अदृश्य पतन है—
जहाँ राष्ट्र का नक्शा, किसी का घरेलू बजट बन गया है,
और नागरिक सिर्फ एक ख़रीदार बनकर रह गया है।
बेवजह के शौक़ और वैभव की इस अंधी दौड़ में,
एक देश रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके अपनी साख खो रहा है।
कितना अजीब है कि जिस मिट्टी से इतिहास उगना था,
वहाँ अब केवल एक निजी स्वार्थ की बेल फैल रही है।
हम जब भी पीछे मुड़कर देखेंगे इस तबाही के बाद,
तो पाएंगे कि हम दुश्मनों से नहीं,
अपनी ही लालच से हारे थे।
इस गिरावट में कोई एक चेहरा गुनहगार नहीं,
हम सब शामिल हैं,
जो चुप रहकर यह तमाशा देख रहे थे।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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