कोई आए आकर सँभाले,
कि सीने में हैं सौ-सौ छाले।
वो आया नहीं लौट कर फिर,
दिए वक़्त ने हमको आले।
उदास इस गली का अंधेरा,
कोई इस सन्नाटे को टाले।
बिना मौत के मर रहे हैं,
कोई तो हमें अब बचा ले।
सुलगती है जो दिल में आतिश,
कोई उस तड़प को बुझा ले।
हवा छू के जो भी गई है,
लगे तन पे जैसे दुशाले।
वह ख़ुशबू जो महफ़िल में बिखरी,
कोई अपनी रूह में बसा ले।
किताबों के पन्ने हैं कोरे,
कोई नाम अपना लिखा ले।
बिछड़ कर हमारा हुआ क्या,
कोई आए आकर छुपा ले।
हथेली पे रक्खे हैं जो ख़्वाब,
कोई आज उनको जगा ले।
ज़माने ने जो दर्द बख़्शा,
चलो उसको अपना बना ले।
पुकारो न तुम अब किसी को,
ख़ामोशी की चादर ओढ़ा ले।
सफ़र आख़िरी मोड़ पर है,
कोई रोशनी ही बढ़ा ले।
तमाशा ख़त्म हो गया अब,
कोई ये दीया ही बुझा ले।
सँभल ऐ 'ललित' इस जहाँ में,
कि सब अपने भी हैं मतवाले।
उठो अब यहाँ से चलें हम,
कि सूने हैं सारे शिवालय।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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