"प्रकृति-पुत्र : सुमित्रानंदन पंत"
हिम-किरीट धारण करे कौसानी की गोद,
जन्मा एक ऋषि-कल्प कवि, ले प्रकृति का बोध।
चीड़-देवदारु के स्वरों में जिसने राग भरा,
वह सुमित्रानंदन पंत, छंदों का नव-विहान धरा।
'उच्छ्वास' में किशोर मन की प्रथम उमंग जगी,
'ग्रंथि' में प्रेम-वेदना की गाँठ खुली-लगी।
'वीणा' के तारों से जब प्रथम स्वर फूटा,
कोमल कल्पनाओं का मधुमास जग टूटा।
'पल्लव' बनकर आई कविता, नव किसलय सी,
शब्द-शब्द में सजी प्रकृति, अलंकारमयी सी।
'गुंजन' में गूँजा जीवन का मधुर संगीत,
सुख-दुख की वीथियों में खोजा नव-गीत।
'युगांत' में देखा उसने बदलते युग का रूप,
मानव-चेतना को दी नव-आशा की धूप।
'ग्राम्या' में उतरा वह धरती के आँगन में,
हल की मूठ थामे किसान के जीवन में।
'युगवाणी' में गाया नव-निर्माण का स्वर,
'स्वर्ण किरण' से चमका जीवन का अंबर।
'स्वर्ण धूलि' में खोजा माटी का सौंदर्य,
'चिदंबरा' में पाया आत्मा का ऐश्वर्य।
'लोकायतन' में रचा महाकाव्य-सा संसार,
जहाँ मिट्टी भी बोलती, बोलता आकाश-तार।
'कला और बूढ़ा चाँद' में दर्शन की बात कही,
ज्ञानपीठ के आलोक से कविता धन्य हुई वहीं।
'रश्मि' बनकर बिखरे उनके भाव अनंत,
'सत्यकाम' में गूँजा सत्य का जयघोष दिगंत।
पंत नहीं केवल कवि, वह प्रकृति का पर्याय,
जिसके काव्य-सरोवर में खिलते भाव-अरविंद।
जब तक हिमगिरि मौन खड़े, जब तक बहे समीर,
पंत की कविता गूँजेगी बनकर अमर शरीर।
युग-युग तक रस-धार बहेगी उनकी वाणी से,
अमर रहेंगे पंत, रहेंगे काव्य की प्राण-धारा से।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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