शून्य हो गयी हूँ मैं,
अपनों की भीड़ में कहीं खो गयी हूँ मैं।
खुद से भी अजनबी हो गयी हूँ मैं।
हज़ारों ख़्वाहिशें, उम्मीदें जन्म लेती रहीं,
मरती रहीं।
कभी हो न सकी वो पूरी,
जो मिला उसी में खुश हो लिये,
ज़िंदगी गुज़र गयी इसी तरह पूरी।
उलझनें ज़िंदगी की सुलझ न सकी,
गाँठें इतनी थीं गहरी कि खुल न सकी।
कभी खुद को भी इंसाफ़ दिला न सकी,
कभी अपने लिये मैं लड़ न सकी।
सोचा था उसको न्याय दिलाऊँगी ज़रूर,
उसके लिये मैं लड़ूँगी ज़रूर, उसके लिये भी मैं कुछ कर न सकी।
वक़्त के हाथों हो गयी मजबूर, आज मैं ख़ामोश हो गयी हूँ।
अब शून्य हो गयी हूँ मैं,
ज़माने की भीड़ में कहीं खो गयी हूँ मैं।
शून्य हो गयी हूँ मैं।
— सरिता पाठक
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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