शब्दों से पहले हमने देखा है संसार,
जहाँ भूख पेट भोजन ने,
इंसान को उठा पटक कर जिंदगी का दृश्य बार बार दिखाया,
संघर्ष में उस वक्त कौन था ज़िंदा,
कौन राहें भटकाया है,
संसार में अपना घर बनाने से पहले उसने अपना घर बचाया है,
भूखे शरीर को रोज एक एक तिनके ने जगाया है,
ये ना करता तो कौन करता,
वो संघर्ष देखा है,
अकेला और सब में,
और मौन ही तो देखता है,
शब्द कहां से लाता,
क्या पेट भर जाता,
पहले पेट भरा है ,
बहुत समय तक देखा है,
फिर कहीं तो सोचा है,
क्या इसी भूख और भोजन में जीना और मर जाना है,
तो कहीं तो शब्द संयोजन किया होगा,,
देख कर कुछ किया होगा,
लिखा होगा,
बोला होगा,
गूंज उठा होगा,
और संघर्ष अब शब्दो में आया है,
संघर्ष बिना जिंदगी नहीं है,
ईश्वर की खोज में भी संघर्ष ही है,
जिंदगी भी संघर्ष ही है,
खुद को ढूंढना भी संघर्ष ही है,
निर्जीव के भी निर्णय को सुनना संघर्ष ही है,
इन जल आकाश थल जीवों के शब्दों को सुनना संघर्ष ही है,
क्योंकि हमने शब्दों से पहले संसार देखा है,
मत भूलो कि बेमेल के मेल से,
संयोजन से ही संसार बना है,
संसार देखने योग्य है,
कर्म के लिए संघर्ष ही योग्य है,
ईश्वर खोजने योग्य है,
सबमें एक आवाज खोजना,
शब्द संयोजन के लिए योग्य है,
मुझे संसार बस देखते रहना है।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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