रिश्तों की भी
एक उम्र होती है,
पर यह उम्र
समय से नहीं,
सहनशीलता से मापी जाती है।
कुछ रिश्ते
बहुत शोर से जन्म लेते हैं—
हँसी, वादे,
और “हम हमेशा साथ रहेंगे”
जैसे भोले वाक्य।
वे रिश्ते
युवा होते हैं,
इसलिए नाज़ुक भी
थोड़ी उपेक्षा,
थोड़ा अहं,
और वे चुपचाप घायल हो जाते हैं।
फिर रिश्ते
धीरे-धीरे
परिपक्व होते हैं,
जहाँ सवाल कम
और मौन ज़्यादा होता है,
जहाँ एक नज़र
पूरे वाक्य का काम कर जाती है।
पर हर रिश्ता
इतनी उम्र नहीं जी पाता।
कुछ
अपेक्षाओं की बीमारी से मर जाते हैं,
कुछ
गलतफहमियों की दवा
समय पर न मिलने से।
सबसे गहरे रिश्ते
वे होते हैं
जो टूटकर भी
पूरी तरह टूटते नहीं
बस चुप हो जाते हैं,
दिल के किसी कोने में
धीमी धड़कन की तरह।
रिश्तों की सबसे अंतिम उम्र
वह होती है
जब शिकायतें थक जाती हैं,
और प्रेम
प्रार्थना बन जाता है।
तब रिश्ते
साथ रहने की ज़िद नहीं करते,
बस
एक-दूसरे के अस्तित्व के लिए
मन ही मन
ईश्वर का धन्यवाद करते हैं।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







