राधा क्यूँ बन गई मीरा का चित्त रूप,
राधा क्यूँ बन गई मीरा का प्रीत रूप,
राधा क्यूँ बन गई मीरा का मीत रूप,
राधा क्यूँ बन गई मीरा का प्रेम रूप,
राधा क्यूँ बन गई कृष्ण के विरह में मीरा रूप,
राधा क्यूँ बन गई मीरा का चित्त रूप।
नज़र से नज़र मिलाने वाला नज़रे ही बनाता है,
नजरे ही बनाता है,
आज जो नज़र मिलाता है,
वही कल नजारे दिखाता है,
इन नज़रों क्यूँ खोए तू,
क्यूँ खोए प्रीत सारा,
राधा क्यूँ बन गई मीरा का चित्त रूप,
राधा क्यूँ बन गई मीरा में विरह रूप।
हाथ न आता है ये,
ये मुरलीधर रणछोड़ है,
सबको नाच नचाता है,
ये माखनचोर है,
गोपियों की मटकियां फोड़े,
गायों का रखवाला,
राधा क्यूँ बन गई मीरा का प्रीत रूप।
गोपियाँ इससे दिल लगाती,
तू भी इसको चाहती है,
मीरा को भी इसकी लत लगा दी,
क्यूँ इतना चाहती है,
ग्वालों का भी सच्चा सखा है,
अपनी माई का राज दुलारा है,
दुश्मनों का भी प्रिय बन गया ये,
जगत को नई दिशा दिखाता है,
सुदामा का प्रिय सखा है,
तीनों लोक देने जाता है,
हाथों से दो निवाले खाकर,
तीसरा भी खाने जाता है,
इतना हृदय का समुद्र है ये,
द्रौपदी की लाज बचाता है,
सबके के बीच में रहकर ये,
आँखों से ओझल हो जाता है,
उद्धव संग रथ से गया,
तुझे साथ न ले जाता है,
अर्जुन को राह दिखाने वाला,
आज सभी की प्रेरणा बन जाता है,
सबको इतना समेटकर ये,
खुद ही गुम हो जाता है,
राधा तुझसे प्रेम करके,
रुक्मणी का हो जाता है,
कैसे रोगी से रोग लगायी,
जोगी बन गई दुनिया सारी,
राधा क्यूँ बन गई मीरा का चित्त रूप।
राधा तू रह गई अधूरी,
मीरा को भी यही काम करने दिया,
साँवरे के संग इतना क्यूँ,
दिल से दिल लगने दिया,
हाथ पकड़ते पकड़ते सारा,
सारा साथ क्यूँ छूट गया,
घर भी छूटा,
परिवार भी छूटा,
संगी साथी सब छूटा,
जग भी छूटा
देह भी छूटा,
दिल भी छूटा,
ज़ज्बात भी छूटा,
सारी कहानी का सार भी छूटा,
एक प्रेम के खातिर,
दिल में इतना बसा बैठी,
खुद ही मूर्त हो बैठी,
खुद ही इतनी व्याकुल थी,
कृष्ण में अमूर्त हो बैठी,
फिर भी ये चेतन प्रेमी तेरे पास ना आया,
राधा क्यूँ बन गई मीरा का चित्त रूप,
मीरा का चित्त रूप। ।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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