कोशिश तों करता हैं पऱ वो पनपने तक नहीं आता
हालात का डूबा फिर कभी उभरने तक नहीं आता
हालात का मारा घर के आँगन में ही खो जाता हैं
तअज्जुब हैं कोई कमरे में ढूंढने तक नहीं आता
ऐसे छूट जाता हैं सब हाथ सें जैसे रेत बिखर गई
वो मर तों जाता हैं अर्थी पऱ मरने तक नहीं आता
लोग पूछते हैं उमरे गुज़र गई तेरी पऱ वहीं का वहीं
उन्हें कैसे बताऊँ मुर्दा फिर सें जीने तक नहीं आता
माज़ी रूह निचोड़ दे तों वो लम्हें कैद बन जाते हैं
वो परिंदा आज़ाद होकर भी उड़ने तक नहीं आता
कृष्णा क़ो महसूस नहीं होता उसका ऐसे मिलना यूँ
वो गले तों लग जाता हैं पऱ लिपटने तक नहीं आता
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







