मील-मील पर बोलियाँ, बँटा हुआ है चित्त।
साँस फँसी जब गले में, कहाँ गए सब मित्त?
कुदरत का विलाप
बीमार हवा की सिसकियाँ, नीर बहाए नीर।
जीवन गिरवी रख दिया, कैसी ये तक़दीर?
स्वयं का अपराध
बाट जोहते रहे हम, आए कोई अवतार।
अपनी ही लाई आग ये, अपना ही घर छार (राख)॥
पहचान का भ्रम
ज़हर न पूछे जात-पात, न पूछे तेरा नाम।
धुआँ निगलता जा रहा, क्या सुबह क्या शाम?
भाषा अपनी-अपनी सही, पर सिसकी एक समान।
घर तो अपना एक है, एक ही है आसमान॥
आत्म-बोध
दोष मढ़ो न और पर, न देखो दूजी राह।
तुम ही जलती मशाल हो, तुम ही अपनी चाह॥
सीधा प्रहार
बहुत हुआ समझावना, बहुत हुई अब बात।
ज़मीं पुकारे पाँव को,करो अब शुरुआत
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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