कहाँ है माया ये वो नहीं है,
नहीं कहो ये माया है,
प्रभु तुम ही हो ये तन मन धन,
प्रभु तुम ही हो ये जो जहां छुपा है,
प्रभु तुम ही हो,
तुम्हें देखें अरसा हुआ है,
बस देखें ही हैं अरसे बाद,
प्रभु तुम ही हो ये कागज में लिखा,
ये पर्चा भी तुम्हारा ही बनता है,
प्रभु तुम ही हो नजरों का फेर,
फेरबदल करता जाता है,
तुम तो सब तक पहुंच गए हो,
पर सब तुम तक पहुंचना चाहते हैं,
पर यही तो भूल करते हैं सब,
जब तुम ही सब तक हो ,
तो सब तुम तक फिर कैसे होंगे,
कोई एक ही पहुंचता है,
दुबारा क्यों ये पहुंचना चाहते हैं,
अब यही काम तो कर चुके हो,
सब तक तुम ही पहुंच गए,
अब कोई भी तुम तक पहुंचने की सोचता है,
तो वो पहुंचने के फेर में तुमसे ही अलग होता है,
तुम मंजिल तुम लक्ष्य तुम सत्य तुम बिंदु,
उस शुरुआत के पास पहले से ही हो,
और फिर भी यात्रा पर निकलते,
हैं जब मंजिल ही थी साथ,
फिर क्यों ये छोड़कर निकलते हैं,
और ऐसे ही तुमसे सब दूर होते हैं,
फिर अबोध मंजिल को पकड़ते हैं,
जिसमें बस फंसते हैं,
ये तुम तक पहुंचने को,
फिर तुम्हीं से अलग होते हैं,
फिर ढूंढते रहते हैं,
चेतन वाले अचेत,
इतना ही समझते,
कुछ ना करते,
सहज स्वीकार से तुम मिल जाते,
कुछ ना होता,
फिर भी सब कुछ होता,
तुम में ही हमेशा रह जाते हैं,
पर नहीं हुआ नहीं हुआ,
किसी ने ध्यान नहीं दिया,
ये मिलन की क्रिया सिर्फ एक करता है,
वो तुम ही कर देते हो,
और ये समझते नहीं है,
पास अपनी दूरी में हो जाता है,
तुम आ ही जाते हो,
और तुम्हें कोई खोज मानकर,
ढूंढने चले जाते हैं,
कैसा जीवन बना जाते,
अरे जो हृदय ही है,
उसे हृदय की लगाने की सोचते हैं,
कैसे मूर्ख आ जाते हैं,
तुम पाए हुए को ये हर पल खोने चले जाते हैं,
इसलिए सबके जीवन व्यर्थ जाते हैं,
प्रभु तुम ही हो ये बहकी दुनिया,
तुम बहकाने ही तो आते हो,
सब महक के लिए,
तेरी बहक आ जाते हैं,
प्रभु तुम ही हो ये बहाव दोहराव,
ये गति आत्म सरोवर के मालिक।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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