कुछ लोग
चेहरे नहीं पहनते,
नक़ाब पहनते हैं।
उनकी मुस्कान में
आत्मीयता का रंग होता है,
पर आँखों की गहराई में
स्वार्थ का एक अनकहा अँधेरा
धीरे-धीरे साँस लेता रहता है।
विश्वास भी कितना भोला होता है—
हर बार
किसी सच्चे स्पर्श की तलाश में
उसी हाथ को थाम लेता है
जो अवसर मिलते ही
उसे अकेला छोड़ देता है।
रिश्ते
जब अभिनय बन जाएँ,
तो शब्दों की मिठास भी
मन को नहीं भिगोती।
वह केवल
एक ऐसी गूँज बनकर रह जाती है
जो देर तक सुनाई देती है,
पर भीतर
कुछ भी नहीं छोड़ती।
सबसे अधिक पीड़ा
धोखे से नहीं होती,
पीड़ा तो तब होती है
जब छल
किसी अपने के चेहरे पर दिखाई देता है।
तब लगता है—
हमने वर्षों तक
जिसे अपना आकाश समझा,
वह तो
बदलते मौसम का एक बादल था;
जिसे अपना किनारा माना,
वह पहली ही लहर में
हाथ छुड़ाकर चला गया।
लेकिन सच की यही नियति है—
वह शोर नहीं करता।
वह प्रतीक्षा करता है।
समय की धीमी चाल के साथ
एक-एक परत हटती है,
एक-एक नक़ाब उतरता है,
और अंततः
चेहरा नहीं,
चरित्र दिखाई देने लगता है।
उस दिन
क्रोध नहीं आता,
केवल एक गहरी चुप्पी जन्म लेती है—
ऐसी चुप्पी
जो मनुष्य को भीतर से बदल देती है।
फिर समझ आता है—
दुनिया में सबसे कठिन काम
दूसरों को पहचानना नहीं,
अपने भीतर की निर्मलता को
बचाए रखना है।
मैं आज भी
विश्वास करना चाहता हूँ,
क्योंकि यदि
कुछ नक़ाब झूठे हैं,
तो कुछ चेहरे अब भी
सत्य की उजली धूप से भरे हैं।
और मैं जानता हूँ—
नक़ाबों की उम्र
समय से छोटी होती है,
पर सत्य का चेहरा
हर युग में
पहचाना जाता है।
डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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