नई खुश्बूओं की तलाश में निकल पड़े हैं लोग फिर
आसमां की फिराक में निकल पड़े हैं लोग फिर
उकता गए हैं ये सारे मुकीम शीशमहल में रहरह के
झोपड़ी की मुराद में निकल पड़े हैं लोग फिर
दिन रात हैं पकवान और इतना अजीम दस्तर खान
डूबने शराबे जाम में निकल पड़े हैं लोग फिर
जो कुछ भी नहीं बाकी है अब रिश्तों की हरारत में
फिर से नई नकाब में निकल पड़े हैं लोग फिर
हम दास कहें क्या उनको जो जिन्दगी से परेशाँ हैं
उलटी ही वो कतार में निकल पड़े हैं लोग फिर


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







