Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

🌝" चाँद से मेरी बातें"🌝

🌝" चाँद से मेरी बातें"🌝

निशा की नीरव गोद में,
जब जग सारा सोता है।
चाँद गगन के आँगन में,
चाँदी-सा रस घोलता है।
मैं चुपके से छत पर आकर,
उससे बात बनाती हूँ।
मन में छिपी हुई व्यथा को,
उसको कह सुनाती हूँ।

मैंने पूछा — हे चंद्रदेव!
तुम इतने शांत क्यों रहते हो?
जग के सुख-दुःख देखते हो,
फिर भी कुछ नहीं कहते हो?

चाँद हँसा, फिर धीरे बोला,
“मन की सुनना सीखो तुम।
दुःख की काली रातों में भी,
आशा के दीप जलाओ तुम।

मैंने भी घटकर देखा है,
मैंने बढ़कर जाना है।
अंधकार के बीच निरंतर,
प्रकाश बाँटना माना है।”

मैंने पूछा, “हे शशि!
बताओ, दूर गगन में रहते हो,
किसकी यादों में खोकर तुम।
रात-रात भर जगते हो?”

चाँद बोला, “नील गगन में,
मेरा अपना कौन यहाँ?
तारे मेरे साथ हैं,
पर धरती-सा अपनापन कहाँ?

कितनी आँखें मुझे निहारें,
कितने मन की आस हूँ मैं।
किसी विरहिणी की अश्रुधार में,
किसी प्रेम का आभास हूँ मैं।

उसकी बातें सुनकर मैंने,
मन का द्वार खोल दिया।
वर्षों से जो पीड़ा छिपी थी,
शब्दों में सब घोल दिया।

मैंने कहा, “हे चंद्र! सुनो,
मन भी कितना भोला है,
हँसता बाहर जग के आगे,
भीतर दुःख का डेरा है।

कभी अपनों की भीड़ में भी,
मन एकाकी हो जाता है।
हँसते मुख के पीछे प्राणी,
कितना कुछ छिपा जाता है।”

चाँद उतरकर किरणों में फिर,
मेरे मन को सहला गया।
सूनेपन की राहों पर वह,
आशा के सुमन खिला गया।

बोला, “जीवन क्षणभंगुर है,
मत दुःख को अधिकार दो।
अपने निर्मल हृदय-कुसुम को,
नव सपनों का हार दो।

जो बीत गया, वह स्वप्न हुआ,
जो शेष, उसे सँवारो तुम।
अपने भीतर दीप जलाकर,
जग में ज्योति प्रसारो तुम।

रात ढली, पौ फटने वाली,
चाँद विदा लेने आया।
उसकी शीतल चाँदनी ने,
मुझको जीना सिखलाया।

आज भी जब मन व्याकुल होता,
नील गगन को तकती हूँ।
चाँद-सखा की स्मृति सँजोकर,
उससे बातें करती हूँ।

हे चंदा! तुम सदा चमकना,
चाहे अमावस छा जाए।
तुम्हारी उजली शीतल किरणें,
हर पीड़ित मन तक जाएँ।

तुम नभ के केवल दीप नहीं,
मन के भी उजियारे हो।
मेरी नीरव रातों के तुम,
सबसे प्रिय सहारे हो।

रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण, (बिहार)




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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (3)

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ममता तिवारी said

बहुत सुंदर रचना बहुत खूब 🙏🙏👌👌

सरिता पाठक said

बहुत सुन्दर रचना, हरपंक्ति ह्रदय को स्पर्श करती चाँद से वार्तालाप को बहुत ही सुन्दर चित्रण, लाजवाब रचना 👌👌आपको शत शत नमन 🙏

उपदेश कुमार शाक्यावार said

अति सुन्दर रचना

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