मैं अकेली हूँ, ये अब शिकायत नहीं रही,
किसी के होने की अब आदत नहीं रही।
उम्मीदें सब से एक-एक कर तोड़ आई हूँ,
अब किसी से कुछ चाहने की हिम्मत नहीं रही।
न कोई सच्चा दोस्त बचा, न कोई प्यार रहा,
दिल किसी के लिए अब बेकरार नहीं रहा।
दुनिया से भी अब कोई मतलब नहीं मुझे,
जो था ही नहीं, उसके खोने का डर नहीं रहा।
किसी के आने-जाने से फर्क नहीं पड़ता,
अब कोई अपना भी अपना सा नहीं लगता।
इतना थक चुकी हूँ खुद से लड़ते-लड़ते,
कि मुस्कुराना भी अब एक दिखावा सा लगता।
अगर मौत भी एक सुकून बन जाए,
तो शायद उसे अपना सा मान लूँ।
ज़िंदगी से जो शिकायतें थीं कभी,
अब उन्हें भी चुपचाप छोड़ दूँ।
✍️ — Gitanjali Gavel


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







