मिट्टी नहीं नशा है बलिदान क्यूँ करते हैं सब,
गर्वित इसकी कहानी है सम्मान क्यूँ करते हैं सब,
इसका भी एक ज़माना है ज़माना भी बदलकर रखती,
मिट्टी नहीं नशा है बलिदान क्यूँ करते हैं सब,
आँखों में तेज चमकता है अग्नि का ताप धड़कता है,
फौलाद सा साहस भरती है बलिदान जो जब करता है,
जौहर में सुकून को देखा जब नारी का अस्तित्व चरम पर चढ़ता है,
छोड़ो वो तो एक मूर्ख कठपुतली थी अर्थहीन बातें करती हैं,
क्या जाने ये मिट्टी का मान जहाँ लहू से भीगने की रीति है,
ये मिट्टी से प्रेम इतना है के हृदय में मिट्टी धधकती है,
मिट्टी नहीं नशा है बलिदान क्यूँ करते हैं सब,
इतिहास का पन्ना हो अतीत की यादें हो,
सब यही कहते है ये वीर रस की धरती है,
नारियां तो यहाँ कि पराकाष्ठा भी पार करती हैं,
अग्नि की ज्वाला में राख भी बलिदान करती हैं,
मिट्टी की जुबानी स्वाभिमान का ही जप तप करती है,
मोक्ष भी सिर झुकाता है बलिदान जो जब करता है,
मिट्टी जिसको जगा दे इतिहास में राज करता है,
आज उनकी तुलना करके किस अभिमान से ग्रसित रहता है,
मिट्टी की कीमत समझ ले वर्ना एक दिन इसी में आकर तू मिलता है,
मिट्टी नहीं नशा है बलिदान क्यूँ सब करते हैं। ।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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