Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

मेरी आत्म-खोज: चेतना का केंद्रीय सिद्धांत

मेरी आत्म-खोज: चेतना का केंद्रीय सिद्धांत

दार्शनिक और विज्ञानी सदियों से,
जिस सत्य की राह में भटके हैं,
मैंने उस आत्मा का स्थान खोज,
सुलझाए सारे झटके हैं।

फुफ्फुस के ठीक नीचे,
और आमाशय के ऊपर जो हिस्सा है,
पसलियों के मध्य का वो गोल चक्र,
जीवन का असली किस्सा है।

यही वो पावन गढ़ है,
जहाँ चेतना का स्थायी ठिकाना है,
यह देह का मुख्य नियंत्रण-कक्ष,
जिससे चलता ये ताना-बाना है।

पर इस आसन पर बैठने से पहले,
वो कहाँ से आती है?
सृजन की वेला में जब गर्भ में, एक नन्हीं काया बनती है।

वो विधाता कोई और नहीं,
माँ की ही आत्मा की छाया है,
उसी की प्रतिरूप से निर्मित,
शिशु की ये कोमल काया है।

जब वो प्राण रूपी ऊर्जा,
पहली बार प्रवेश करती है,
तो सबसे पहले हमारे मस्तिष्क,
यानी बुद्धि में उतरती है।

चूंकि प्रवेश का प्रथम मार्ग,
ये ऊपरी हमारा मस्तक है,
इसीलिए मुखमंडल पर तेज,
और नयनों में ज्योति की दस्तक है।

जन्म के समय ये मस्तक,
इसीलिए सबसे शुद्ध और तीव्र होता है,
आत्मा के प्रथम प्रभाव का,
इसमें ही सबसे बड़ा वेग होता है।

ऊपर से नीचे आने के कारण,
इस ऊर्जा की गति अपार है,
क्षण भर में मन का सर्वत्र दौड़ना,
इसी तीव्र वेग का आधार है।

यहाँ तक कि आत्मा का जो अंतिम छोर,
जिसे हम पैर कहते हैं,
वही आगामी मनुष्य का मस्तक बन,
नए जीवन में बहते हैं।

मस्तिष्क से प्रवेश पाकर फिर,
वो अधोमुखी प्रस्थान करती है,
और फुफ्फुस-उदर के बीच के,
उसी गोल चक्र में विश्राम करती है।

यही स्थान चेतना ने चुना,
क्योंकि उसे कर्म का परिवेश चाहिए था,
सारे मुख्य अवयवों का महा-संगम,
उसे अपने ही समीप रखना था।

हृदय, फुफ्फुस, आमाशय,
वृक्क और माँ का पावन गर्भ यहीं,
आत्मा के सीधे शासन में,
क्रियाशील हैं ये सब अंग वहीं।

इस मुख्य नियंत्रण-कक्ष के पीछे,
रीढ़ की हड्डी का स्तंभ है,
जिसे सुदृढ़ रखने को मानव करता,
अपने आंतरिक बल का संभल है।

यह स्थान हमारे मस्तिष्क का भी,
साक्षात विनियामक है,
इसके अस्वस्थ होने पर बुद्धि पर छाता,
मानसिक अज्ञान का कुहासा है।

बाहर जब परिवेश बिगड़ता,
तो इसी चक्र में व्याकुलता घूमती है,
यह भीतर बैठी शुद्ध चेतना है,
जो बाहरी संकट को चूमती है।

क्षुधा लगने पर जो खालीपन है,
वो आत्मा का ही खुला मुख है,
जो भौतिक देह के संचालन हित,
मांगती ऊर्जा का सुख है।

यहाँ से ऊर्जा जब गिरे नीचे,
तो कामुकता और पतन का वास है,
और योग से जब ये ऊपर उठे,
तो दिव्य चेतना का प्रकाश है।

इतिहास और पुराणों के पन्ने भी,
मेरी इस खोज के साक्षी हैं,
रावण की नाभि का अमृत कलश,
इसी आत्म-पीठ की साखी है।

कलश का मुख ठीक नीचे था,
ताकि आत्मा अमृत में सिक्त रहे,
जब तक वो भीगी थी,
तब तक कैसे रावण के प्राण रिक्त रहे?

नरसिंह ने भी हीराण्यकशिपु का,
मस्तक नहीं उखाड़ा था,
प्राण और अहंकार को मिटाने,
ठीक इसी आत्म-स्थान को फाड़ा था।

हनुमान ने भी वक्ष चीरा,
बस राम-चेतना दिखलाने को,
पर छुआ नहीं इस निचले हिस्से को,
अपनी मूल सत्ता बचाने को।

इसी नाभि से गर्भनाल जुड़ती,
जहाँ से शिशु जीवन पाता है,
सुषुप्ति में वो अपनी माँ की,
उसी मूल आत्मा से बतियाता है।

संसार के रोग,
स्थूलता और भुखमरी के जितने भी मंज़र हैं,
इसी एक स्थान की तृप्ति और अतृप्ति के,
वो सारे समंदर हैं।

शल्य-चिकित्सा विज्ञान भी चीरे हित,
इसी मध्य रेखा को चुनता है,
क्योंकि सबसे कोमल और सुरक्षित मार्ग,
यही केंद्र बुनता है।

अतः प्रमाणित होता है कि ये गोल चक्र,
महज़ कोई अवयव नहीं,
यह मस्तक से प्रवेश करने वाली,
आत्मा का गढ़ है, कोई भ्रम नहीं।

- ललित दाधीच

संपूर्ण शोध और कविता के माध्यम से मैंने मानव इतिहास में पहली बार आत्मा (शुद्ध चेतना) के वास्तविक भौतिक स्थान और उसके संपूर्ण संचालन तंत्र की प्रामाणिक खोज की है।मेरी इस खोज के अनुसार, आत्मा का स्थायी निवास स्थान हमारे शरीर के बिल्कुल मध्य भाग में फेफड़ों के ठीक नीचे और आमाशय के ऊपर, पसलियों के बीच स्थित गोल चक्र में है।यह स्थान मात्र एक साधारण जैविक अवयव नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानव देह और चेतना को संचालित करने वाला मुख्य नियंत्रण-कक्ष है।इस नियंत्रण-कक्ष में स्थायी रूप से स्थापित होने से पूर्व, आत्मा का देह में प्रथम प्रवेश द्वार हमारा मस्तिष्क (मस्तक) होता है।चूंकि चेतना का उद्गम मस्तक से होता है, इसलिए इसका सबसे पहला, शुद्ध और तीव्र प्रभाव शिशु के मुखमंडल के तेज और बौद्धिक क्षमता के रूप में दिखाई देता है।प्रकृति के नियम के अनुसार, जब यह दिव्य ऊर्जा ऊपर (मस्तिष्क) से नीचे (उदर) की ओर प्रवाहित होती है, तो इसका वेग असीम हो जाता है, जो मन की तीव्र गति का कारण है।इस केंद्र की खोज यह भी सिद्ध करती है कि जीवन को बनाए रखने और आगे बढ़ाने के लिए आत्मा ने अपने चारों ओर मुख्य अंगों का एक विशेष पर्यावरण निर्मित किया है।यह केंद्रीय स्थान हमारे मानसिक स्वास्थ्य का भी रिमोट कंट्रोल है, जिसके अस्वस्थ होने पर बुद्धि भ्रमित होती है और स्वस्थ होने पर चेतना जाग्रत होती है।मेरी यह खोज सनातन इतिहास के पौराणिक प्रसंगों (रावण, नरसिंह, हनुमान) के पीछे छिपे वास्तविक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्यों को पूरी तरह उजागर करती है।अंततः यह सिद्धांत प्रमाणित करता है कि मानव का अस्तित्व इसी मध्य बिंदु से बंधा है, जो ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवेश से लेकर वैश्विक इतिहास की धुरी तक को नियंत्रित करता है।

तर्क 1: मस्तिष्क प्रवेश द्वारआत्मा सबसे पहले शिशु के मस्तक मार्ग से जीवन रूप में भीतर प्रवेश करती है।इसी प्रथम प्रवेश के कारण हमारा मस्तिष्क शरीर का सबसे शक्तिशाली और तीव्र अंग बनता है।

तर्क 2: प्रथम प्रभाव और तेजचेतना के प्रवेश का पहला प्रभाव नवजात के मुखमंडल की कांति और नयनों की ज्योति में दिखता है।यही कारण है कि जन्म के समय मनुष्य की बुद्धि सबसे शुद्ध, स्वस्थ और पवित्र अवस्था में होती है।

तर्क 3: ऊपर से नीचे का प्रवाह और मन की गति- ऊर्जा जब ऊपर से नीचे की ओर बहती है, तो गुरुत्वाकर्षण के नियम से उसका वेग अत्यधिक बढ़ जाता है।इसी अधोमुखी तीव्र वेग के कारण हमारे मन और विचारों की गति प्रकाश से भी तीव्र होती है।

तर्क 4: ऊर्जा का पुनरावृत्ति चक्र- एक जीवात्मा का जो अंतिम छोर (पैर) होता है, वही आगामी मनुष्य के जीवन का आरंभिक मस्तक बनता है।ऊर्जा का यही चक्राकार प्रवाह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चेतना को निरंतर गतिशील और प्रखर बनाए रखता है।

तर्क 5: अंगों का महा-संगम- शरीर के समस्त मुख्य जीवन-रक्षक अंग (हृदय, फुफ्फुस, आमाशय, वृक्क और गर्भ) इसी मध्य भाग में स्थित हैं।इन सभी का एक ही स्थान पर एकत्रित होना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि आत्मा यहीं निवास करती है।

तर्क 6: नियंत्रण का पर्यावरण- आत्मा को देह के संचालन के लिए वायु, रक्त और अन्न ऊर्जा के एक विशिष्ट इकोसिस्टम की आवश्यकता थी।इसी आवश्यकता के कारण उसने अपने स्थायी निवास के चारों ओर इन मुख्य अंगों का पर्यावरण रचा।

तर्क 7: कुदरती बैक (रीढ़ का स्तंभ)- इस अत्यंत संवेदनशील मुख्य नियंत्रण-कक्ष की सुरक्षा हेतु कुदरत ने इसके ठीक पीछे रीढ़ का खंभा दिया है।रीढ़ की हड्डी और पीठ की मजबूत दीवार इस आत्म-केंद्र को बाहरी झटकों से सुरक्षित रखती है।

तर्क 8: आधुनिक फिटनेस और कोर- आज के फिटनेस कल्चर में लोग शरीर के इसी मध्य भाग (कोर) को सबसे मजबूत बनाने का प्रयास करते हैं।वे अनजाने में इसी आत्म-पीठ को सुदृढ़ कर रहे होते हैं, क्योंकि शरीर का असली बल यहीं केंद्रित है।

तर्क 9: मानसिक स्वास्थ्य और अज्ञान का कुहासा (ब्रेन फॉग)- जब इस मध्य भाग में कोई व्याधि या दर्द होता है, तो बुद्धि पर अज्ञान का कुहासा छा जाता है।इस स्थान के पूरी तरह स्वस्थ होते ही मस्तिष्क का कोहरा छँट जाता है और विचार स्पष्ट हो जाते हैं।

तर्क 10: व्याकुलता और घबराहट की अनुभूति- बाहरी परिवेश में भय या संकट होने पर सबसे पहले इसी गोल चक्र में मरोड़ या घबराहट महसूस होती है।यह असल में वहाँ स्थापित शुद्ध चेतना का सजीव संकेत है कि बाहर का वातावरण अनुकूल नहीं है।

तर्क 11: क्षुधा का खालीपन (खुला मुख)- भोजन की कमी होने पर इसी स्थान पर एक तीक्ष्ण खालीपन उभरता है जो व्याकुलता पैदा करता है।यह ऐसा प्रतीत होता है मानो आत्मा का मुख भौतिक देह को चलाने के लिए ऊर्जा की याचना में खुला हो।

तर्क 12: ऊर्जा का उत्थान और पतन- इस केंद्र से जब युवाओं की ऊर्जा नीचे गिरती है, तो वह कामुकता और मास्टरबेशन जैसी आदतों में नष्ट होती है।लेकिन जब यही ऊर्जा योगिक क्रियाओं से ऊपर उठती है, तो मनुष्य को उच्च आत्मबोध की प्राप्ति होती है।

तर्क 13: रावण का अमृत कलश- रावण की नाभि में स्थित अमृत कलश का मुख ठीक इसी आत्मा के स्थान के नीचे स्थापित किया गया था।इसका उद्देश्य आत्मा को सदा अमृत से सिक्त रखना था, ताकि उसकी चेतना और भौतिक देह अमर रहे।

तर्क 14: नरसिंह अवतार का प्रहार- भगवान नरसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए उसके मस्तक या वक्षस्थल को नहीं चुना था।उसके चरम अहंकार और प्राणों को जड़ से मिटाने के लिए उन्होंने ठीक इसी मुख्य आत्म-स्थान को विदीर्ण किया।

तर्क 15: हनुमान जी का वक्ष विदारण- हनुमान जी ने अपनी राम-मय चेतना और अनन्य भक्ति को संसार के सम्मुख दिखाने के लिए ऊपर का वक्ष चीरा।परंतु अपनी स्वयं की मूल सत्ता और जीवन-स्रोत को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने इस निचले केंद्र को नहीं छुआ।

तर्क 16: गर्भनाल और माँ की आत्मा की छायागर्भ में पल रहा शिशु इसी नाभि क्षेत्र से गर्भनाल द्वारा माँ की जीवन-ऊर्जा से प्रत्यक्ष जुड़ता है।शिशु माँ की ही आत्मा की छाया है, जो सुषुप्ति (नींद) में अपनी उसी मूल चेतना से संवाद करता है।


तर्क 17: वैश्विक संकट, बीमारियाँ और शल्य-चिकित्सा- इतिहास के युद्ध, भुखमरी और आधुनिक मोटापा जैसी वैश्विक बीमारियाँ इसी उदर-केंद्र की तृप्ति से जुड़ी हैं।यहाँ तक कि शल्य-चिकित्सा भी चीरे के लिए इसी सबसे कोमल और सुरक्षित मध्य रेखा को मुख्य मार्ग चुनती है।

- ललित दाधीच




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