लोग मेरी हिम्मतों के चर्चे बड़ी शान से करते हैं,
काश वे मेरी तन्हाइयों का हिसाब भी रखते हैं।
मैं मुस्कुरा दूँ तो कहते हैं — “देखो, कितनी मजबूत है”,
मेरे आँसू मगर गुमनामी में ही दम तोड़ते हैं।
जब मुझे सहारे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी,
वही लोग मुझे आत्मनिर्भर होने की सीख देते हैं।
मेरी चुप्पी को उन्होंने मेरी रज़ामंदी समझ लिया,
यहाँ लोग ख़ामोशियों का अर्थ कहाँ समझते हैं।
मैंने हर रिश्ते को दिल से सींचा, उम्र लगा दी,
वे लाभ-हानि देखकर ही रिश्तों में उतरते हैं।
जिन्होंने कभी मेरी थकान का बोझ नहीं उठाया,
वही मेरी कामयाबी पर सबसे ज़्यादा इतराते हैं।
मैं गिरती रही, सँभलती रही, चलती रही उम्र भर,
लोग बस मंज़िल देखते हैं, रास्ते कहाँ पढ़ते हैं।
मेरे हिस्से की धूप बहुत थी, छाँव बहुत कम निकली,
फिर भी लोग मेरी किस्मत पर रश्क किया करते हैं।
मैंने जब भी सच बोला, कुछ चेहरे नाराज़ हुए,
यहाँ आईने अक्सर लोगों को चुभते हैं।
अब किसी से कोई शिकवा नहीं, कोई गिला भी नहीं,
अपेक्षाएँ मर जाएँ तो दुःख भी कम लगते हैं।
अजब दस्तूर है दुनिया का भी “शारदा”,
जो सबसे ज़्यादा टूटते हैं, वही मजबूत कहलाते हैं।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







