दिन रात मशीनों के साथ
मेहनत करता हूँ
कुछ खून कुछ पसीना
बनता रहता हूँ
पसीना और खून
परिवर्तित होकर
कुछ हिरा , कुछ कोहिनूर
बनता रहता हूँ
किसी पूंजीपति के
बदन पर चमकता
रहता हूँ
एक खबर सा बनता
रहता हूँ
फिर भी मैं
हर वक्त
बंद कमरे में
लगी मशीनों के साथ,
कल पुर्जों सा घुमता
रहता हूँ
उठाओ तुम इतिहास का
कोई भी पन्ना,
हर पन्ने में मैं
निशब्द सा छिपा
रहता हूँ ,
कभी कभी लगता है
जैसे समय के पहिये सा
मैं ही घुमता रहता हूँ
पूंजीवाद की धुरी पर ही
रुका रहता हूँ


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







