माटी कभी बोलती नहीं,
फिर भी उसकी हर दरार
एक लंबी कहानी कहती है।
वह चुपचाप
धूप की तलवारें सहती है,
बारिश की चोटें झेलती है,
पैरों तले रौंदी जाती है,
फिर भी
हर मौसम में
जीवन उगाने का साहस करती है।
उसके हिस्से में
न कोई ताज आता है,
न कोई जयकारा।
वह बस
अपने भीतर बीजों के सपने सँजोए
हर बार
खुद को फिर से बिखेर देती है।
कितनी अजीब बात है—
जो सबसे अधिक सहता है,
उसी को सबसे कम सुना जाता है।
माटी जानती है
कि संघर्ष का अर्थ
केवल लड़ना नहीं होता,
कभी-कभी
संघर्ष का अर्थ होता है
टूटकर भी
किसी और के लिए
हरी उम्मीद बन जाना।
एक किसान की हथेली पर
जब उसकी खुशबू उतरती है,
तो लगता है
धरती ने अपने आँचल से
आशीर्वाद उतार दिया हो।
और जब सूखा
उसकी साँसों तक पहुँच जाता है,
तब भी वह
आसमान से शिकायत नहीं करती।
वह बस
क्षितिज की ओर देखती है,
मानो विश्वास अभी भी
बादलों के रास्ते में खड़ा हो।
हम सब
कहीं न कहीं
इसी माटी से बने हैं।
हमारे भीतर भी
कुछ दरारें हैं,
कुछ अधूरे मौसम,
कुछ अनकहे दर्द,
और कुछ ऐसे बीज
जो अभी भी
सही समय की प्रतीक्षा में हैं।
इसलिए
जब भी जीवन तुम्हें रौंदे,
अपमान की धूप जलाए,
या परिस्थितियाँ
तुम्हें बंजर घोषित कर दें—
तब माटी को याद करना।
वह सिखाती है
कि सबसे बड़ी शक्ति
ऊँचा दिखने में नहीं,
गहरा बने रहने में है।
क्योंकि
माटी कभी हारती नहीं—
वह हर बार
अपने संघर्ष को
फसल में बदल देती है।
और शायद
इसीलिए
धरती पर सबसे सुंदर चमत्कार
आकाश नहीं करता,
माटी करती है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







