माँ बिना मायका अपना सा नहीं लगता,
वही आँगन, वही दीवारें हैं,
फिर भी हर कोना चुपचाप रोता है,
जैसे घर ने अपनी धड़कन खो दी हो,
सब कुछ अधूरा-अधूरा लगता है।
माँ की आवाज़ से जो घर
हर सुबह खिल उठता था,
उसके आँचल में छिपकर
हर दुःख पिघल जाता था।
उसकी एक पुकार में
सारी दुनिया का सुकून था,
हथेली सिर पर पड़ते ही
हर डर छोटा हो जाता था,
और आँखों में ठहरा हुआ दर्द
बिना आँसू बने ही बह जाता था।
अब मायके की देहरी पर
कदम तो रखती हूँ,
पर हर कोने में माँ को
ढूँढ़ती हुई ठहर जाती हूँ।
दरवाज़ा खुलता है, हवा आती है,
पर वह आवाज़ नहीं आती,
जो मेरी थकी आत्मा को
बिना कहे सँभाल लेती थी।
कभी लगता है, अभी भीतर से पुकारेगी,
“आ गई मेरी बच्ची?”
पर सन्नाटा ही लौटकर
मेरे सीने से लिपट जाता है।
वो रसोई, वो आँगन,
माँ का प्यार से बुलाना,
चूल्हे की आँच और रोटियों में
आज भी उसका दुलार महकता है,
पर छूने को नहीं मिलता
उसका स्नेहिल प्यार।
बर्तनों की खनक में भी
उसकी चूड़ियों की आवाज़ खोजती हूँ,
और हर निवाले के साथ
उसकी याद गले में अटक जाती है।
सब कुछ वहीं है शायद,
बस माँ नहीं है वहाँ।
उसकी अनुपस्थिति ने जैसे
घर की धड़कन रोक दी है।
दीवारों पर टँगी तस्वीरें
मुझे देखती रहती हैं,
पर उनमें से कोई हाथ बढ़ाकर
मेरे आँसू नहीं पोंछता।
माँ के बिना मायका भी
बस यादों का सूना कोना बन जाता है।
माँ जहाँ नहीं होती,
वहाँ बचपन भी कहाँ मिलता है।
माँ चली जाती है तो लगता है,
जैसे अपना ही एक हिस्सा खो गया,
जैसे लौटकर भी लौट नहीं पाती हूँ
उस दुनिया में, जहाँ मैं निश्चिंत थी।
और मायका कितना भी पास हो,
दिल उससे दूर हो जाता है।
क्योंकि मायका घर से नहीं,
माँ की बाँहों से बनता है—
क्योंकि माँ बिना मायका
मायका सा नहीं लगता।
माँ बिना ये घर, घर सा नहीं लगता
- सरिता पाठक
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
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