Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

माँ बिना मायका

माँ बिना मायका अपना सा नहीं लगता,
वही आँगन, वही दीवारें हैं,
फिर भी हर कोना चुपचाप रोता है,
जैसे घर ने अपनी धड़कन खो दी हो,
सब कुछ अधूरा-अधूरा लगता है।
माँ की आवाज़ से जो घर
हर सुबह खिल उठता था,
उसके आँचल में छिपकर
हर दुःख पिघल जाता था।
उसकी एक पुकार में
सारी दुनिया का सुकून था,
हथेली सिर पर पड़ते ही
हर डर छोटा हो जाता था,
और आँखों में ठहरा हुआ दर्द
बिना आँसू बने ही बह जाता था।
अब मायके की देहरी पर
कदम तो रखती हूँ,
पर हर कोने में माँ को
ढूँढ़ती हुई ठहर जाती हूँ।
दरवाज़ा खुलता है, हवा आती है,
पर वह आवाज़ नहीं आती,
जो मेरी थकी आत्मा को
बिना कहे सँभाल लेती थी।
कभी लगता है, अभी भीतर से पुकारेगी,
“आ गई मेरी बच्ची?”
पर सन्नाटा ही लौटकर
मेरे सीने से लिपट जाता है।
वो रसोई, वो आँगन,
माँ का प्यार से बुलाना,
चूल्हे की आँच और रोटियों में
आज भी उसका दुलार महकता है,
पर छूने को नहीं मिलता
उसका स्नेहिल प्यार।
बर्तनों की खनक में भी
उसकी चूड़ियों की आवाज़ खोजती हूँ,
और हर निवाले के साथ
उसकी याद गले में अटक जाती है।
सब कुछ वहीं है शायद,
बस माँ नहीं है वहाँ।
उसकी अनुपस्थिति ने जैसे
घर की धड़कन रोक दी है।
दीवारों पर टँगी तस्वीरें
मुझे देखती रहती हैं,
पर उनमें से कोई हाथ बढ़ाकर
मेरे आँसू नहीं पोंछता।
माँ के बिना मायका भी
बस यादों का सूना कोना बन जाता है।
माँ जहाँ नहीं होती,
वहाँ बचपन भी कहाँ मिलता है।
माँ चली जाती है तो लगता है,
जैसे अपना ही एक हिस्सा खो गया,
जैसे लौटकर भी लौट नहीं पाती हूँ
उस दुनिया में, जहाँ मैं निश्चिंत थी।
और मायका कितना भी पास हो,
दिल उससे दूर हो जाता है।
क्योंकि मायका घर से नहीं,
माँ की बाँहों से बनता है—
क्योंकि माँ बिना मायका
मायका सा नहीं लगता।
माँ बिना ये घर, घर सा नहीं लगता

- सरिता पाठक


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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (4)

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सुप्रिया साहू said

मायका जाते ही माँ को ढूंढती हुई निगाहें अब माँ को ना देख मौन सा हो जा रहा है, जो आंगन कभी खुशियों, डांट और शरारतों से भरी होती थी वही आंगन आज सुना लग रहा है, सच में माँ, माँ होती है उसकी याद हमेशा आती है और उसकी बातें सत्य अवश्य होती है, बहुत खूबसूरत रचना सरिता मैम 👌👌, आपको सादर प्रणाम 🙏🙏।

ममता तिवारी said

क्योंकि मायका घर से नहीं,
माँ की बाँहों से बनता है
क्योंकि माँ बिना मायका
मायका सा नहीं लगता
माँ बिना ये घर, घर सा नहीं लगता ..... वाह सरिता मैडम जी वाह दिल को छू गई रचना लाजवाब लाज़वाब काफी सुंदर आत्मा खुश हो गई बहुत सुन्दर प्रस्तुति बेहतरीन बेहतरीन शानदार शानदार रचना काबिले तारीफ अति उत्तम बहुत सुंदर सादर प्रणाम आपको 🙏 🙏 👌👌❤️❤️

ममता तिवारी said

बहुत सुंदर बेहतरीन बेहतरीन 🙏🙏❤️❤️👌👌

ललित दाधीच said

पर सन्नाटा ही लौटकर
मेरे सीने से लिपट जाता है।
बहुत सुंदर पंक्तियां शानदार, माँ की आत्मा से ही तो बच्चे जीवित रहते हैं बाकी उन्हें किस जगह ठोर है, आपकी रचना लड़कियों की उस पीड़ा को बताती जिसे समाज नहीं समझता है, बहुत खूब।।

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