उनकी याद में हम आज फिर शायर बन गए,
कभी हम दोनों ऐसे ही महफ़िल
लगाया करते थे।
एक शेर वो सुनाते, एक हम सुनाते थे,
और दिल की बातों को ऐसे ही
उजागर करते थे।
वो महफ़िल भी क्या महफ़िल होती थी,
जिसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ खुशियों की
बौछारें होती थी।
हर तरफ़ सुकून ही सुकून था
उस महफ़िल में,
हर शेर में बेपनाह प्यार और वफ़ादारी की
ख़ुशबू होती थी।
उनकी हाज़िर जवाबी का तो
क्या ही कहना था,
हमारे शेर का आखरी लफ़्ज़
पेश होता नहीं कि उनका शेर ज़ुबान पर
उतर आता था।
बड़े कायल थे हम उनके और उनके
शायराना अंदाज़ के,
हर पल उन्हीं का नाम और काम
हमारी ज़ुबान पर होता था।
🖋️ रीना कुमारी प्रजापत 🖋️
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







