ख़फ़गी (नज़्म)
देखते हो, पर देखते नहीं हो तुम
मिलते हो, तो टकराके गुज़र जाते हो
पहले की तरह अब क्यों नहीं मिलते मुझसे
क्यों अब सिर्फ़ ख़्वाबों में नज़र आते हो
जाने किस बात की ख़फ़गी है तुम्हें
जाने किस सोच में तुम गुम हो
हो सके तो कभी मुझसे मिलो बात करो
जाने क्यों तुम इतने गुमसुम हो
क्या ये कोई अदा है तेरी
या दिल दुखाने के ये बहाने हैं
इतनी नाराज़गी से न देखो
आख़िर हम तेरे दीवाने हैं
जान देते यार हम तुम पर
तुम्हें देखे बिना क़रार नहीं
एक बार दिल पे हाथ अपने रखकर
तुम ये कह दो, कि तुमको प्यार नहीं
कहीं तेरी ये ख़फ़गी न जान ले ले मेरी
कुछ तो अब बोल, ऐसे ख़ामोश न हो
कहीं ये वक़्त, ये मौसम न बीत जाए यूं ही
बाद में कहीं तू यहाँ सोचता न रहे
और फिर इसका तुझे अफ़सोस न हो।
अनमोल


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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