खुद को साबित करना क्या इंसान होना है?
फिर इंसान होना क्या है?"
न बर्बादी का खौफ है हमें,
न इस अंधी दौड़ में शामिल होना है,
हम अंततः एक इंसान हैं,
हमें कागज़ के टुकड़ों पर खुद को साबित नहीं करना है।
गैरों की क्या तोहमत,
जब अपनों के लहजे ही तीर बन जाएं,
त्योहार की वो रात भी ज़हरीली लगी,
जब सगे ही दर्द दे जाएं।
लिबास पुराना और नंगे पैर देख कर हँसती है ये दुनिया 'ग़ालिब',
इन्हें क्या खबर कि इस मलबे के नीचे कैसा हुनर पल रहा है।
वफ़ा की चाह में निकले तो देखा मिसल-ए-बाज़ार है दुनिया,
यहाँ तो हर रिश्ता इक सौदा है, कोई सात्विक दिल कहाँ।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







