खुद में देखूँ तो मैं भी खुदा हूँ,
पर इसी चक्कर में मैं खुद से जुदा हूँ।
मैं इंसान ही तो था,
अन्दर की इंसानियत को देखना था,
पर ऐसा देखने में जी लगा कि,
उस अंतिम शख्स को ढूंढने में,
उसी की जगह लेने पर मैं,
आज खुद पे ही फिदा हूँ,
इसी चक्कर में सबसे पहले मिटा हूँ।
एक इस मैं को ही तो जानना था,
और वो था इंसान ही तो,
और इंसानियत उसका मूल भाव था,
करना क्या था विचार और संतुलन,
पर खोज की अति और लालच में सबसे ज्यादा पीटा हूँ,
इसी चक्कर में सबसे ज्यादा मैं ही बिका हूँ।
अब तक दुनिया में इंसानियत से ज्यादा नया कुछ नहीं,
पर अभी वही अनावश्यक कर्मो को सीखा हूँ,
इसी चक्कर में अपराधों में सबसे ज्यादा मैं ही मिला हूँ।
वो ईश्वर है और उसका ऐश्वर्य है,
वो जैसा है उसी भाव से आगे बढ़ता,
इसलिए कुछ भी कर सकता है,
तुम्हें लगता है तुम्हें वो क्षमा करता है,
किस भावना में उलझे हो,
वो जीवन दिया है तो उसकी एक कीमत है मृत्यु,
वो एक उम्र दिया है
तो उसमें दिया है बचपन और बुढ़ापा,
जहाँ तुम खुद को सम्भाल नहीं पाते,
वो समझदारी दिया है उसमें भी एक देता गलतफहमी,
जहाँ बुद्धि और दिल की ज़ंग रही,
समझो ये कि जो हमें सबसे ज्यादा,
सुकून और शांति देती है,
जो हमें सबसे ज्यादा प्रेम और जागरुक रखती है,
तुम वो सभी शब्द जानते हो,
जो तुम्हें सफ़लता दिलाते हैं,
ये सभी एक ही रास्ता है इंसानियत,
जहाँ भाग्य और परीणाम के आधिकारिता की जरूरत नहीं,
जहाँ तुम अपने पूरे जीवन निश्चिंत रह सकते हो,
जहाँ तुम आगे बढ़ोगे ,
जहाँ तुम्हारा पूर्ण विकास होगा,
और तुम्हारा घर भी चलेगा,
कोई तंगी भी नहीं होगी,
सत्य भी बोल पाओगे,
डर भी नहीं होगा,
सब नकारात्मक भाव समाप्त होंगे,
किसी की सलाह भी नहीं लेनी होगी,
बस यह इंसानियत का ध्यान करो,
और इंसानियत के कर्म करो,
इंसानियत ही जीवन है,
इससे तो सब जी छुड़ा कर भाग रहे हैं,
तुमसे कह रहा हूँ अपना लो,
सब चाहे कुछ भी कहें कि इससे कुछ नहीं होता,
पर तुम इंसान हो और इंसानियत रहने दो,
शायद ये दुःख जो आज सब जगह है,
ये इंसानियत की जगह लिया होगा,
इंसानियत रहती तो दुःख कुछ था ही नहीं,
अब अपनी इस गलतफहमी वाले दुःख को निष्क्रिय करो,
और इंसानियत की प्रक्रिया शुरू करो।
इतना कह फिर मैं उसी जुए में बाज़ी रखता हूँ,
इसी चक्कर में बढ़ा चढ़ाकर बातें करता हूँ।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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