Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

खुद इश्क़ में

इतने भी नादां ना हुए,
कि इश्क़ के अंजाम ना हुए,
जो महक कर चल दिए,
अब फिर से उनके अहसान ना हुए,
वो ही थे क्या,
जिनसे प्रेम हुआ,
क्यूँकि अभी तक,
इश्क़ के इंसाफ ना हुए,
पर्वत से गिरने वाले पत्थर,
फिर पर्वत ना हुए,
ऊँचाइयों से आकर,
फिर ऊंचाई ना हुए,
पथरीली चट्टानों से कठोर सा पत्थर,
कितना कोमल हुआ कि,
मिट्टी हुआ,
समा भी गया,
और नया जीवन भी बन गया,
जहां भी बना,
जहां की हर जगह,
हर चीज़ में छुप गया,
लगता है जैसे,
मेरे शरीर पर कपड़े भी,
वो ही बनकर आया है,
मेरे भीतर बाहर भी,
सब उसी का,
सब वो ही है,
जो खुद निर्जीव,
बेजान,
कठोर,
अना के शिखर पर था,
आज वो मेरा ही,
तन मन और धन भी है,
लगता भीतर की,
आखिरी बची राख भी उसी की है,
फिर मेरा है क्या,
कहां ढूँढे,
कि मैं कहीं हूँ,
उसके बिना तो,
भूखा और बिमार ही हूँ,
जो उसी की जमीन पर,
वो भी उसकी है,
कि उसके ना होने से,
हो जाता है,
कोई तुम्हारे बिना तो,
खोखला भी नहीं है,
कि ऐसे ही,
वो ही मिट्टी,
कितनी गहराई तक जमा होती है,
नीचे फिर वो ही कठोरता,
वो अपनी फिर अना के कारण,
या वो फ़ना ही लगता है,
फिर फ़ना होने को,
अना होती है,
कि फिर ऊंचाई पर जाएँ,
खुद में ही फूटे,
बिखर जाएँ,
गिरते हुए,
एक पूर्ण सूक्ष्मता से,
फिर फ़ना हो,
फिर जा मिले,
खुद में ही खुद मिल जाना,
खुदा को कितना भाता है,
ऐसे ही इंसान है,
फ़ना से होकर आता है,
फिर दुनिया में,
खुदा से खुद बनने,
फिर खुदा तक जाने,
वो अथाह सी जमीन से निकलता है,
माँ की कोख से जन्म लेता है,
परिवार में औरों के अनुभवों से बड़ा होता है,
फिर समाज में आता है,
खुद को खोजता हुआ,
कर्म करता है,
कर्म के हर क्षेत्र में जा मिलता है,
सब के अनुभव से सीखकर,
फिर अपने भी अनुभव बनाता है,
संघर्ष की ज़मी से गिरता है,
कोमल होता है,
बिखरता है,
सूक्ष्म होकर,
उसका हर एक हिस्सा,
पूरी दुनिया के हर हिस्से को छूने जाता है,
कि कोई संशय ना,
ना कारण हो कि,
इसके लिए फ़ना हुए,
इसके ना होने से फ़ना हुए,
ऐसा कोई भी हिस्सा,
खुद होने के बाद,
सबसे निकलकर,
सबसे गुजरने के बाद फ़ना हुए,
इंसान समाज से देश और देश से दुनिया,
दुनिया से सारा जहां छूने के बाद,
खुद ही इतना ऊंचाई,
इतना कठोर,
सक्षम होने के बाद,
परिपक्वता और अपनी पूर्णता,
और ऊँचाई की अना के बाद,
खुद की हलचलों के बाद,
गिरता जाता है,
वही उसी,
अनजान ना होना अना,
बस फ़ना हो जाता है,
फिर वापिस उठता है,
जो उसकी चेतना से,
खुद चुनता है,
कितनी ऊँचाइयाँ,
कितना जीना है,
अना होती है फ़ना,
फ़ना फिर फ़ना होने को,
अना से गुजर इतनी अथाह,
ऊंची अना को ले जाती है,
कि खुद निकलकर,
फ़ना होना ही मुमकिन है,
वहां से कुछ बचता भी नहीं,
लेकिन वही जो मिलन है,
उसके बाद,
जो मिलन हो,
वो चयन के बाद वाला मिलन है,
उनसे मिलकर फिर मिलना,
वही मिलन है।

इतना इश्क़ करना कि वो हो,
पर वो हो इश्क़ जो खुद इश्क़ में है,
इसी इश्क़ में इश्क करने वाला,
खुद इश्क़ में होश में इश्क़ करता है। ।


- ललित दाधीच




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