न कोई काम है, न कोई शाम है
वैसे पल मेरे जीवन में आनेवाले हैं
तारा बन जाऊँगी मैं, आकाश में नहीं
हर होंठ पर मुस्कान बनकर जलूँगी मैं
तितली बन जाऊँगी मैं, रंगबिरंगी नहीं
सिर्फ सफेद दुपट्टा ओढ़कर घूमूँगी मैं
हवा बनकर आ जाऊँगी मैं, कोई मुझे याद करे तो
मेरे लफ़्ज़ों को पढ़ते ही एक तरह की खुशबू फैलूँगी मैं
आकाश में मेघ बनकर अपनी कलम से बरसती हूँ मैं
पृथ्वी छूते ही बीज बनकर बार बार फूल की तरह खिल जाऊँगी मैं ।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







