साँसें भी ले लूँ तो भी काफी है,
जीने की कौन कह रहा है।
दर्द भी ले लूँ तो भी काफी है,
मुस्कराने की कौन कह रहा है।
कपड़े पहन लूँ तो भी काफी है,
घर बनाने की कौन कह रहा है।
संघर्ष भी बलिदान भी मिटा भी दो तो भी काफी है,
आसान मुश्किलें सुकून में कौन रह रहा है।
आज भी 'ललित' जीना अगर मशक्कत है,
तू गिरा भी दे तो जख्म ले लूँ तो भी काफी है,
जहां की किस्मते माथे पर कौन ले रहा है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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