बेशक!!
दीपक का सा यह तन हमारा,
लौ सी हैं यह साँसें हमारी,
जो जलती सिर्फ़ उसकी मर्जी से ।
किस हवा में इतनी ताकत,
जो बिन उसकी मर्जी के
इन्हें बुझा सके।
जब दिन भी उसके,
रातें भी उसकी,
हर पल नज़र में हम उसके,
फिर न जाने क्यों—
हमारी हर धड़कन में डर बसता,
नज़र लग जाने का,
कुछ पाने का , कुछ खोने का ।
क्या अजीब जीवन है
कुछ पाने को हर साँस”मैं”जीता हूँ।
कुछ खो देने के डर से
हर साँस “मैं “मरता हूँ।
वन्दना सूद
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







