इश्क़ मेरी मर्ज़ी है या ख़ुदा की ख़ुदग़र्ज़ी है,
मिलने वाले खड़े हैं बिछड़ने वालों की क़तारों में।
जो विदाई के डर से कभी घर से निकले नहीं,
वो तसल्ली ढूँढते हैं अब विज्ञापनों के इशारों में।
हथेली पर रखे हैं सबने अपने-अपने समझौते,
यहाँ हर कोई शामिल है इस दौर के व्यापारों में।
हवाएँ अब किसी का लिखा हुआ सच नहीं पढ़तीं,
सिर्फ़ एक सन्नाटा तैरता है इन ख़ाली गलियारों में।
चेहरों को बदलने का हुनर सीख लिया है सबने,
अब कोई ढूँढता नहीं ख़ुद को पुराने आईनों में।
मंज़िल की आख़िरी सीमा पर कोई मिला ही नहीं,
रास्ते ही थक कर सो गए मोड़ के सन्नाटों में।
ख़ामोशी की भाषा अब कोई समझता नहीं यहाँ,
हर जज़्बात को तौलते हैं लोग अब शोर के पैमानों में।
धूप का एक टुकड़ा भी अब मुफ़्त नहीं मिलता,
हर उजाला बंद है यहाँ रसूख़दार मकानों में।
अपनी ही आज़ादी की भीख माँगनी पड़ रही है,
कैसा ये अजीब दौर आया है इन इंसानों में।
अब अपनी ही आँख से देखना होगा 'ललित' मंज़र,
कि हर सच धुंधला हो चुका है इन चश्मों में।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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