कल तक हँसती-खेलती जी रही थी वो,
आज कैद में है बुलबुल।
कल तक अपने ख़्वाबों में पंख लगा आसमां में उड़ रही थी वो,
आज पाँव के नीचे ज़मीं भी नहीं है।
कल तक अपने प्रीतम के आगोश में जाने को तड़प रही थी वो,
आज प्रीतम तो है पर प्रेम का आगोश नहीं है।
कल तक मायके के वृक्ष पर बैठी चिड़िया सी चहक रही थी वो,
आज ख़ामोश है, दिल से निकलती कोई आवाज़ नहीं है।
कल तक छत की मुंडेर पर बैठी कोयल सी कुहक रही थी वो,
आज गीत तो है पर कोई साज़ नहीं है।
कल तक अपनों की भीड़ में बहुत खुश लग रही थी वो,
आज भीड़ तो है पर कोई साथ नहीं है।
आज तन्हा खड़ी सोच रही है वो…
क्या कैद में है बुलबुल।
— सरिता पाठक
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







