अजीब समय है—
हमारी आँखें
हमेशा उस दिशा में लगी रहती हैं
जहाँ अभी कुछ भी नहीं है,
और पीठ फेर लेते हैं
उस ओर
जहाँ जीवन
चुपचाप अपना दीप जलाए बैठा है।
हमने इच्छाओं को
इतना ऊँचा सिंहासन दे दिया है
कि अपने ही घर में बैठे हुए सुख
हमें छोटे लगने लगे हैं।
रोटी थाली में है,
मगर हम
कल की दावत के सपनों में भूखे हैं।
माँ पुकारती है,
पिता चुपचाप दरवाज़े पर प्रतीक्षा करते हैं,
बच्चे अपनी मुट्ठी में
पूरा आकाश लेकर हँसते हैं—
और हम...
एक ऐसे आकाश के पीछे भाग रहे हैं
जिसका कोई किनारा नहीं।
यह कैसी दौड़ है
जिसमें मंज़िल मिल भी जाए
तो रास्ते में छूटे हुए लोग
वापस नहीं मिलते?
मैंने देखा है—
बहुत-से लोग
शिखर तक पहुँचकर भी
अपनी ही आवाज़ खोजते रहे।
क्योंकि
ऊँचाइयाँ हमेशा
संतोष नहीं देतीं,
कई बार
वे सिर्फ़ यह बता देती हैं
कि नीचे छूट गई ज़मीन
कितनी अपनी थी।
जो नहीं है,
उसे पाने का अधिकार तुम्हें है;
सपने देखना भी
मनुष्य होने की पहचान है।
लेकिन इतना याद रखना—
यदि अप्राप्त की प्यास
तुम्हारे भीतर बहती नदी को ही सुखा दे,
तो वह प्यास नहीं,
एक धीमा विनाश है।
जीवन का सबसे बड़ा दुःख
यह नहीं कि
हम सब कुछ नहीं पा सके;
सबसे बड़ा दुःख तो यह है
कि जो हमारे पास था,
उसे पहचानने की फुर्सत ही नहीं मिली।
और जब यह फुर्सत मिलती है,
तब तक
घर के आँगन में खड़ा वह पेड़
किसी और की छाँव बन चुका होता है।
इसलिए—
जब अगली बार
तुम किसी अधूरे स्वप्न के पीछे दौड़ो,
तो एक बार पलटकर देख लेना।
कहीं ऐसा न हो
कि जिसे पाने निकले हो,
उससे कहीं अधिक मूल्यवान
वह सब पीछे छूट जाए
जिसके सहारे
तुम आज तक जीवित रहे हो।
क्योंकि मनुष्य
अप्राप्त से नहीं टूटता—
वह तब टूटता है
जब उसे बहुत देर से पता चलता है
कि उसने
प्राप्त को ही खो दिया।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







