एक संत साहित्य समाज का एक चिंतन सामने आता रहा है कि जिस व्यक्ति को कुछ समझ में ना आए तो जिसने ये दुनिया को उद्दीप्त किया है उसके भरोसे सब छोड़ दो, कह दो कि ये जो कुछ हो रहा है वो अब तेरे हाथ तूने जाने, ये तेरा काम मुझे नहीं समझ आता है तू ही संभाल, पर ऐसा क्यों? उसके भरोसे क्यों? क्योंकि हमारे जीवन में भी हमारी गतिविधियों में गेम्स का बहुत प्रचलन है, गेम्स बनाता डेवलपर है और खेलते हैं हम सब तो जब गेम्स कोई भी बग आता है या ग्लिच आता है तो हम उस डेवलपर को फीडबैक देते हैं कि ये समस्या है, गेम्स सही से नहीं चलता है तब डेवलपर अपग्रेड करता है तो इसी तरह हमारी लाइफ में भी खूब परेशानियां आती है तब हम भी निष्क्रिय हो जाते हैं तो जो हमारे साथ खेल रहा है वो फिर ईश्वर से कम्पलेंट करता है कि ये अमुक व्यक्ति अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर रहा है तब हमें भी उस समय कुछ नहीं करना चाहिए क्योंकि वो समस्या और हम वो बग है जिसे हमारा डेवलपर ही सुधार सकता है और वो किसी पर नजर रख दें तो चीजें अपने आप अपग्रेड होगी है तो बहुत सी समस्याओं के समय कुछ मत करो, वहीं सही तरीका है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







