ये कैसे जाले लगे हैं क़िस्मत में हमारी,
जितना हटाने की कोशिश करते हैं
ये उतने ही उलझते जाते हैं।
बड़ी ही कश्मकश में चल रही है ज़िंदगी,
लाखों कोशिशों के बाद भी कोई तोड़
निकलता नहीं।
हर बार नई-नई उम्मीद लगाते हैं
और कामयाबी के लिए
जी तोड़ मेहनत करते हैं,
पर कमबख़्त तक़दीर
जहां सभी का साथ दे रही
वहीं आकर हमारा साथ छोड़ देती है।
आंसू निकल आते हैं
अक्सर कोसते हुए इस फूटी क़िस्मत को,
कमबख़्त हँसती है हमारे आँसुओं पर
और ज़्यादा रुलाने को।
🖋️ रीना कुमारी प्रजापत 🖋️
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







