आगे बढ़ना मुमकिन नहीं कश्ती मल्लाह मांगती हैं
ये जिंदगी मुझसें महबूब की एक निगाह मांगती है
एक कमरे में सिमट के रह गई तमाम जिंदगी मेरी
ये चार दीवारी भी अब तों मुझसें पनाह मांगती हैं
मेरे पैरो का लहु नहीं देखा छलनी दामन नहीं देखा
मंजिल की चौखट मुझसें रास्ते के गवाह मांगती हैं
मुहब्बत के दर पऱ जिसे माँगा मैंने वहाँ भी शर्ते थी
मुहब्बत की रिवायते मुझसें मुक़द्दर तबाह मांगती हैं
मुमकिन ही नहीं मुहब्बत भी मिले और शफ़क़त भी
ये ख़िदमत-ए-वालिदैन ख्वाहिशों का दाह मांगती है
इश्क़-मुहब्बत का ज़ब्त-ए-ग़म ताउम्र क़ो ठहर गया
वहीं मुहब्बत बहे अश्क़ का हिसाब अथाह मांगती हैं
दर्द हद पार कर गया कृष्णा की साँस आह मांगती हैं
बहने वाला लहु जमकर बर्फ हुआ रगे डाह मांगती हैं
-कृष्णा शर्मा
शफ़क़त = माता-पिता प्रेम
ख़िदमत-ए-वालिदैन = माता-पिता की सेवा
ज़ब्त-ए-ग़म = गहरें दर्द क़ो पी जाना बिना आह के


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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