रात के दो बजे
घड़ी ने
दीवार पर सोई चुप्पी को
दो बार छुआ।
कमरे में
कुछ नहीं जागा—
सिर्फ मेरी साँसें,
जो अँधेरे में
टूटी सीढ़ियों पर
किसी अनजानी छत की ओर
चढ़ती-उतरती रहीं।
खिड़की खोली तो
चाँद सामने था—
एक पुराना खत,
जिसकी कुछ पंक्तियाँ
बारिश बहा ले गई थी,
और कुछ
किसी ने पढ़कर
हमेशा के लिए
अपनी आँखों के पीछे
रख ली थीं।
मैंने उसका नाम
नहीं लिया।
कुछ नाम
होठों तक पहुँचते-पहुँचते
इतने पुराने हो जाते हैं
कि उन्हें पुकारना
अपने ही सीने में
बंद किसी कमरे की
कुंडी खोलना होता है।
मेज़ पर रखा
खाली गिलास
पूरी रात
मुझे देखता रहा।
कभी उसमें
दो हथेलियों की गर्मी थी,
अब उसकी तलहटी में
बस थोड़ी-सी ठंडी रोशनी
जमी थी—
जैसे किसी बीती शाम ने
वहाँ अपना आख़िरी ताप
छोड़ दिया हो।
मैंने आँखें बंद कीं—
और भीतर
एक पुराना घर खुल गया।
वही दरवाज़ा,
वही सीढ़ियाँ,
वही खिड़की
जिससे कभी शाम
घर में उतरती थी।
दीवार पर
एक तस्वीर टँगी थी।
उसमें
मैं था—
मगर मेरी आँखों में
वह आदमी नहीं था
जो आज
आईने में खड़ा था।
मैंने उस कमरे से
बाहर निकलना चाहा।
फर्श पर
काँच नहीं था,
फिर भी
हर कदम
पैरों के भीतर
एक महीन चुभन
छोड़ जाता था।
शायद रास्ते में
काँच नहीं—
कुछ अधूरे दिन
अपने नुकीले किनारे
छोड़ गए थे।
मैं गिरा नहीं।
बस एक पल को
धरती ने
मेरा भार
अपने पास रख लिया।
कोई हाथ नहीं आया।
हवा आई—
मेरे माथे पर पड़ी
एक लट हटाई,
और जैसे उसे
मेरे दुख का पता ही न हो,
आगे निकल गई।
तभी
कमरे की बंद दराज़ों से
आवाज़ें निकलने लगीं।
कुछ शब्द
जिन्हें कभी कहा था,
कुछ जिन्हें निगल गया था,
और कुछ ऐसे
जो वर्षों से
मेरे भीतर
बिना आवाज़ के
अपना घर बनाते रहे।
वे आपस में टकराईं,
फिर मेरी चुप्पी पर
बारिश की तरह गिरती रहीं—
जब तक कि
वह भीगकर
अपने ही भार से
ढह नहीं गई।
मैं फिर उसी जगह पहुँचा
जहाँ से
कभी भागा था।
वहीं,
जहाँ मेरी ताकत
किसी सूखे पत्ते की तरह
हथेली से छूटकर
किसी अनदेखी हवा में
गुम हो गई थी।
फिर—
बहुत देर बाद,
सुबह से ठीक पहले,
खिड़की की चौखट पर
ओस की एक बूँद मिली।
इतनी छोटी
कि उसे देखकर
कोई उम्मीद का नाम भी
न दे।
मैंने उसे छुआ नहीं।
बस देखता रहा।
दूर कहीं
आकाश का रंग
बदल रहा था।
और उस छोटी-सी बूँद में
पूरी रात के बाद
पहली बार
कुछ ऐसा था—
जो टूटकर भी
गिरा नहीं था।
सुबह ने
दरवाज़ा नहीं खटखटाया।
वह बस
चौखट पर
एक बूँद बनकर
चुपचाप बची रही।
-इक़बाल सिंह ‘राशा’
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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