समझनी पड़ती हैं उम्मीदें और परेशानियां भी,
चंद दीवारों और छत से घर नहीं बनते
घर बनता है उन अनकहे शब्दों से
जो आंखों की कोरों पर ठहर जाते हैं,
उन चुप्पियों से
जो शोर से कहीं ज़्यादा बोलती हैं।
घर बनता है उस प्रतीक्षा से
जब कोई देर तक लौटकर नहीं आता,
और दरवाज़े की आहट पर
धड़कनें दुआ बन जाती हैं।
यह बनता है रसोई की उस खुशबू से
जिसमें मां की थकान घुल जाती है,
और पिता की चिंता
चाय की भाप में धीरे-धीरे उड़ जाती है।
घर ईंटों का नहीं, एहसासों का आशियाना है,
जहाँ टूटे हुए दिन भी
किसी के कंधे पर सिर रखकर
फिर से जुड़ने लगते हैं।
जहाँ हर कोना
किसी याद का संरक्षक होता है,
और हर दीवार
किसी अधूरी कहानी को
अपनी चुप्पी में संजोए रखती है।
समझना पड़ता है हर मुस्कान के पीछे का दर्द,
हर खामोशी के भीतर की पुकार
तभी तो बनता है एक घर।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







