बंजारों की तरह हम सबने घरबार खो दिया हो,
डूबे इस कदर मोबाइल में परिवार खो दिया हो।
अब देखते रहते हैं आँगन, खिलौने और खेल,
बच्चे खेलते कहाँ हैं मानो इतवार खो दिया हो।
इस कदर वो उलझे हुए हैं अपनी ही यादों में,
जैसे तूफान में नाविक ने पतवार खो दिया हो।
दीवारें खामोश हैं और कमरे सब हैं जुदा-जुदा,
लगता है मकान ने अपना संसार खो दिया हो।
खत, राब्ते और वो बातें अब गुज़रे दौर की हैं,
रूबरू मिलने का हमने वो इंतज़ार खो दिया हो।
🖊️सुभाष कुमार यादव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







