ये क्या तमाशा है कि 'बेटा' खुदा बना बैठा है?
और एक 'बेटी' के वजूद पर सिर्फ सवाल है!
यहाँ तो रूहें भी 'किराए' की हैं,
मगर शोर ऐसा, कि जैसे बहुत कमाल है।
तुम जिसे औरत कहते हो, वो तुम्हारे लिए 'माल' है,
सिर्फ बदन की भूख है, बाकी सब ढाल है।
वो बूढ़ी औरतें, जिन्होंने खुद को खुद ही खाया,
अब उनकी गोद में पला, हर बच्चा एक काल है।
मोहब्बत? यहाँ तो सिर्फ 'भुक्कड़ों' का मेला है,
वफ़ा मर चुकी, अब सिर्फ 'भोग' का झमेला है।
सब अचेतन के अंधे हैं, हवस के शोर में डूबे,
यहाँ इंसान नहीं, बस 'जिस्मों का रेला' है।
तुम जिसे 'चेतन' कहते हो, वो दिमागी सड़न है,
हर ज़हन में यहाँ, बस 'मांस' की लगन है।
आवाज़ें तो कब की 'मौन' के मलबे में दब गईं,
अब तो बस इस 'मुर्दा बस्ती' का जश्न-ए-दफन है।
जी में आता है, कि इस खंदक में ज़हर भर दूँ,
तुम्हारी इस 'खोखली रूह' को और भी बंजर कर दूँ।
मगर तुम तो पहले ही मर चुके हो ,
अब क्या मैं इन 'लादों' को और बे-असर कर दूँ?


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







