Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

फूल सी अच्छाई

फूल सी अच्छाई है,
नहीं कर रहा कोई बुराई है,
बहुत कम समय बिताती है,
इसमें कितना इतराती है,
कांटों के बीच रहती है,
नहीं कुछ भी कहती है,
सुगंध तो देती है,
पर दुनिया इसके नखरे सहती है,
कीमत में उसको उलझाए तो,
किसी के भी हाथों टूट जाती है,
दिखती सुन्दर है,
पर कमजोर रह जाती है,
आधी अधूरी रहती है,
दिन भर बुराई सहती है,
जब खुद को बुराई के दलबल से अकेला पाती है,
अचानक मुर्झा जाती है,
अच्छाई के संख्या बल में कमी,
खुद पर विश्वास में कमी,
इसके घनत्व में कमी,
स्वयं पहचान की त्रासदी से झूलती है,
ठहरना नहीं जानती,
इंसान इस पर शक करते हैं,
पर बुराई आज ज्यादा है होना बुराई नहीं है,
बल्कि उसकी सकारात्मकता है,
वो अपने आपको पूर्ण शक्ति के साथ स्थापित करती है,
खुद के साधन खुद जुटाती है,
शांतिकाल में काम करती है,
इंसानों को बुराई पाठ सरल भाषा में देती है,
वो संख्या बल रखती है,
सबको पहचान देती है,
और घनत्व रखती है,
बुराई की बुराई नहीं करती,
शक नहीं रहने देती,
पूरा जीवन जी के जाती है,
इसलिए अंत में खुद को आबाद कर,
तबाही कर जाती है,
अब बुराई तो गुल है,
जंगल सा माहौल है,
और अच्छाई बस बीच बीच में फूल रह जाती है,
अस्थाई अच्छाइयों को एक दिशा बदलनी होगी,
कि वो शक ना करें,
कि फूल सी अच्छाई से जीवन चलेगा या नहीं,
वो भूल जायें की उसका सामना बुराई से है,
उसे सकरात्मक होना है कि,
बुराई में भी अच्छाई है,
तभी मेरी प्रतिद्वंदी और सामने है,
बाकी फूल के ही तो गुलदस्ते है,
बस इन्हें उस बुराई के चालकों को देना है,
बुराई अच्छाई का भेद मिटाना है,
बस इंसानियत जगाना है,
बाकी इंसानों का लगा रहेगा आना जाना हैं,
आज इस जीवन में,
कल उस जीवन में किसी का ज़माना है,
बिना जागे तो ये शहर धूलखाना है,
बुराई के तन से अच्छाई के मोती को ढूंढ लाना है,
और इंसानों को बस तसल्ली दे जाना हैं,
क्यूँ उन्हें हर बात पर उलझाना है,
क्यूंकि ईश्वर ने जो इंसानियत और इंसान की खोज की है,
उसके आगे तो इंसान ही रह जाना हैं,
वो जिस घर में था,
तब हम नहीं थे,
उसने उस घर में,
इंसान रखे,
इंसानियत सोची,
इंसानियत की चाबी से दरवाजा खोलकर,
निकल गया,
अब हम इस घर में है,
अपनी इंसानियत के साथ,
जिस दिन हर इंसानी सदस्य इंसानियत में रह जाएगा,
उसी पल वो दरवाजा खोलकर,
अगले घर जाएगा,
तब तक ईश्वर भी आगे बढ़ जाएगा,
अगले घर में कौन है,
क्या उसका काम,
यही तो इंसानो का अंतिम प्रश्न रह जाएगा,
इंसान अगर इंसानियत से खो ही जाएगा,
बस अकेला इस घर में तड़प जाएगा,
आज जीवन तो बड़ा है इंसानियत छोटी है,
मात्र चयन रह गयी,
पर यही अनिवार्य थी,
यही होने का भाव थी,
यही नहीं रहीं बस सिर्फ,
लोगों जिंदगी आज उदासी रही,
इंसानियत पहले बाकी,
क्रमशः अस्तित्व प्रेम सत्य सब बाद में है,
मैं तो कहता रहूंगा,
आप सभी अनुभव और साक्षात्कार लेने के बाद,
सकारात्मक कदमों के साथ,
इंसान और इंसानियत के मिलन से,
इस घर के दरवाजे को खोले,
और जाएँ,
आप इंसान हैं,
इसलिए आप मेरे लिए अकाट्य रूप आवश्यक है,
क्यूँकी आपके पास मेरा विषय,
मेरी प्राथमिकता,
इंसानियत है,
बाकी मेरा कोई संवाद जीवित नहीं है,
इंसानियत के अलावा,
बाकी सबकुछ मैं मज़ाक में जी रहा हूँ,
जैसे वर्तमान के मन मनुष्य की आदत है,
कोई बात चुभ जाएँ तो,
मुझे भूल जाएँ,
कोई बात रह जाएँ तो,
क्षमा करें,
क्यूँकी लिखने और शब्द संयोजन की,
मेरी आदत है,
नैसर्गिक सन्यासी हूँ मैं,
लिखने की आदतें वैराग्य देती हैं,
बाकी आप पढ़ते हैं,
तभी रचनाओं से ज्यादा पाठक अच्छे हैं,
बाकी पुरानी बचकानी,
गुज़री जिंदगी को देखें,
तो अभी आपके सामने बच्चे हैं,
इसलिए सत्य को पकड़े,
प्रेम में कच्चे,
नींद लेने में अच्छे हैं,
आलस है,
इसलिए लिखने की सोच लेते हैं,
और व्यावहारिक दुनिया से बचे रहते हैं,
साहित्य मीठा है,
शब्दों में रहता है,
व्यावहारिक दुनिया धरातल देखती हैं,
हम वहां पैर रखते ही,
अपंग हो जाते हैं,
तो बस फिर लिखते जाते हैं,
कि यहाँ हम हैं तो,
यहीं जीवन है,
यही जीवन है। ।

- ललित दाधीच




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