"दो पीढ़ियों की कहानी"
नब्बे के दशक की दुनिया थी अलग,
कैसेट और डिस्को की थी ताल,
लैंडलाइन फोन पर बातें होती थीं,
और चिट्ठियों का इज़हार होता था।
पड़ोस के रेडियो पर बिनाका गीत था,
दूरदर्शन पर रविवार का इंतज़ार होता था।
एक आने की टॉफी में त्योहार होता था।
छत पर एंटीना घुमाते शाम ढल जाती थी।
पापा की साइकिल के पीछे बैठना भी सफर लगता था।
वीडियो गेम्स और कार्टून की दुनिया में,
हम खोए रहते थे हर वक्त,
स्कूल के दोस्त और खेल के मैदान,
जीवन की सबसे बड़ी खुशी थी।
गिल्ली-डंडा, कंचे और पतंग की डोर,
बचपन की वो सबसे हसीन जागीर थी।
बारिश की बूंदों में कागज़ की नाव तैरती थी।
मिट्टी की खुशबू में सारा जहान बसता था।
दोस्त की कॉपी से होमवर्क उतारना भी यारी लगता था।
आज की जेनरेशन की दुनिया अलग है,
स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का जमाना है,
एक क्लिक पर दुनिया सामने है,
लेकिन आंखों में वो चमक कहाँ?
रील्स की भीड़ में सुकून खो गया है,
स्टेटस में सब है पर दिल का सुकून कहाँ?
वर्चुअल लाइक्स में असली मुस्कान खो गई है।
हेडफोन लगाकर ये खुद से ही दूर हो गई है।
चार्जर ढूँढते-ढूँढते इनका आधा दिन बीत जाता है।
नब्बे के दशक में हमने सीखा था,
जीवन के मूल्य और रिश्तों का मोल,
आज की जेनरेशन सीख रही है,
जीवन की गति और तकनीक का खोल।
हमने धैर्य से इंतज़ार करना सीखा,
ये तुरंत की दुनिया सब्र को भूल रही है।
हमने टूटे रिश्तों को जोड़ना सीखा, ये ब्लॉक करना सीख रही है।
हमने गलती पर माफ़ी मांगना सीखा, ये सीन करके छोड़ रही है।
हमने आँगन में रिश्ते बुनना सीखा, ये स्क्रीन पर दोस्ती ढूँढ रही है।
हमने देखा है जीवन की कठिनाइयों को,
और सीखा है उनसे लड़ना,
आज की जेनरेशन देख रही है,
जीवन की चुनौतियों को और उनसे उबरना।
हम मीलों पैदल स्कूल जाते थे,
ये कैब बुक कर कॉलेज पहुँचती है।
हमने माँ के हाथ की रोटी का स्वाद चखा, ये ज़ोमैटो का स्वाद चख रही है।
हमने फटी जेब में भी सपने पाले थे, ये EMI पर सपने खरीद रही है।
हमने 2 रुपये बचाने को मीलों चलना सीखा, ये 2 मिनट बचाने को पैसे उड़ा रही है।
दो पीढ़ियों की कहानी है ये,
दो अलग-अलग दुनिया की बात है,
लेकिन फिर भी एक बात समान है,
जीवन की खुशी और प्यार का मोल।
दादा-दादी की कहानियों में जो जादू था,
वो आज पॉडकास्ट में कोई ढूँढ रहा है।
हमारे बचपन की लोरियों की मिठास, आज की लोरी ऐप में कौन ढूँढे?
हमारे आँगन की तुलसी का दिया, आज एयर प्यूरिफायर में कहाँ मिले?
हमारी छत पर टूटते तारों की दुआ, आज वाई-फाई सिग्नल में कहाँ दिखे?
नब्बे के दशक की जेनरेशन ने सीखा था,
जीवन को सरल और प्यार से जीना,
आज की जेनरेशन सीख रही है,
जीवन को तकनीक और गति से जीना।
हम खत लिखकर महीनों जवाब बुनते थे,
ये एक इमोजी से सब कह जाती है।
हमने आँखों से बात करना सीखा, ये टाइप करके जता रही है।
हमने त्योहारों पर गले मिलना सीखा, ये वीडियो कॉल पर विश कर रही है।
हमने एल्बम में यादें संजोना सीखा, ये क्लाउड में यादें भर रही है।
दोनों पीढ़ियों को चाहिए,
एक दूसरे से सीखना और समझना,
जीवन की खुशी और प्यार को,
एक दूसरे के साथ बांटना।
हमारे अनुभव इनकी उड़ान बनें,
इनकी सोच हमारी नई पहचान बनें।
हमारी जड़ें इन्हें थामे रहें, इनके पंख हमें आसमान दिखाएँ।
हमारा सुकून इनकी रफ्तार बने, इनकी रफ्तार हमारा गुर बने।
हमारा धैर्य इनका ब्रेक बने, इनका जोश हमारा एक्सेलरेटर बने।
और अंत में यही कहूंगी,
दोनों पीढ़ियों का अपना महत्व है,
नब्बे के दशक की जेनरेशन ने दिया है,
आज की जेनरेशन को एक नया भविष्य।
कल की यादें और आज के सपने मिलकर,
आने वाले कल को और खूबसूरत बनाएँगे।
न पुराना कम था, न नया कम है, बस वक्त के साथ अंदाज़े-बयां कम है।
वक्त बदला, लिबास बदला, पर दिल के जज़्बात वही हैं, बस अंदाज़ नया है।
मंज़िल एक है रास्ते जुदा हैं, चलो हाथ थाम लें, सफर तो अपना है।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार )


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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