ग़ज़लें
राम नरेश 'उज्ज्वल'
(1)
उसूलों पर चलोगे तो जमाना क्या कहेगा।
शराफत से रहोगे तो जमाना क्या कहेगा।।
मुहब्बत में लिखी जिसने तुम्हें हर साँस, हर धड़कन।
न उसको भी छलोगे तो जमाना क्या कहेगा।।
तुम्हारे नाम से ही काँप जाती रूह तक सबकी।
खुदा से तुम डरोगे तो जमाना क्या कहेगा।।
प्राण हैं कीमती अपने, करो बस फिक्र इसकी ही।
वतन पर मर मिटोगे तो जमाना क्या कहेगा।।
नहीं कुछ होश अपना है, नशे में धुत हैं सारे।
सम्भल कर तुम चलोगे तो जमाना क्या कहेगा।।
सूख कर गिर गए पत्ते, ठूँठ बनकर खड़े हैं हम।
जड़ों को अर्घ्य दोगे तो जमाना क्या कहेगा।।
भूख से बिलबिलाना और रोना भाग्य है जिनका।
दया उन पर करोगे तो जमाना क्या कहेगा।।
यहाँ है बोलबाला आजकल तो देवदत्तों का।
अगर गौतम बनोगे तुम जमाना क्या कहेगा।।
(2)
कदम-कदम पर हम करते हैं दोंग पुराने जाने क्यों।
मन के भीतर भी रखते हैं, लाख बहाने जाने क्यों।।
फूल, कली, तितली, भौंरा कोयल, बुलबुल, तोता, मैना।
चुपके-चुपके ये आये हैं जश्न मनाने जाने क्यों।।
चाँद-सितारों की बातें अब लगती हैं बेकार हमें।
बच्चों ने भी छोड़ दिए हैं स्वप्न सजाने जाने क्यों।।
बार-बार मन आता-जाता रहता अपने गाँव में।
फिर भाये हैं वही पुराने ठौर-ठिकाने जाने क्यों।।
लहर-लहर में तरंग उठी है, बूँद-बूँद लेती अँगड़ाई।
पुरवाई भी छेड़ रही है मधुर तराने जाने क्यों।।
बाजारों में रंग-बिरंगे चूड़ी, कँगन खूब बिके।
गूँगे अधरों ने भी गाये गीत सुहाने जाने क्यों।।
पीली-पीली सरसों भी अब फूल रही है खेतों में।
दूर देश से भेजा न संदेश पिया ने जाने क्यों।।
जिसके पास नहीं जागीरें, नहीं तिजोरी सोने की।
उसके आगे भी झुकते हैं लोग सयाने जाने क्यों।।
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सम्पर्क
उज्ज्वल सदन, मुंशीखेड़ा , लखनऊ, उ.प्र.
29 इमेज वॉच, मासिक, जुलाई, 2008
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The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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