ठाठ से जीना है हमें तो तुम जीने नहीं देते,
ऐसे - ऐसे इल्ज़ाम अब लोग लगाने लगे हैं।
फ़िक्र, प्यार, ख़याल को कुछ समझते नहीं,
और दौलत की रईसी में खुशियां ढूंढने लगे हैं।
अपने - अपने नसीब का सभी को मिलता है,
फिर क्यों लोग दोष बेगुनाह को देने लगे हैं।
थोड़ा सा रुख क्या बदला ज़िंदगी ने कि
जो सबसे अज़ीज़ समझता है उसी को डंसने लगे हैं।
जो दिल का अमीर है उसे तवज्जो देते नहीं,
और दिखावे के प्यार की ओर भागने लगे हैं।
जो किया उसने उसके लिए वो याद नहीं उसे,
और दौलत के नशे में सच्चे प्यार को मिटाने लगे हैं।
जो शोहरत से अमीर नहीं उसे प्यार करते नहीं,
और वो लालच में अब रईसों को ढूंढने लगे हैं।
एक वक्त पर जो बहुत कुछ था मानो सब कुछ था,
आज उसी खास को नाकारा निकम्मा कहने लगे हैं।
उनके हालात ठीक थे तो शान से खड़े थे उनके साथ,
अब बदलाव हुए कुछ तो वो हाथ छुड़ाने लगे हैं।
ऐसे मोड़ पर कोई पराया भी ना छोड़े किसी को,
उस हालत में वो उन्हें तन्हा कर दूर - दूर रहने लगे हैं।
ज़िम्मेदारियों पर बड़ी - बड़ी बातें करते थे जो,
आज वही अपनी ज़िम्मेदारियों से भागने लगे हैं।
ऐसा हुआ क्या है उनके मन मस्तिष्क को कि
जान से ज़्यादा प्यार करने वालों को ही दगा देने लगे हैं।
🖋️ रीना कुमारी प्रजापत 🖋️
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







