चिट्ठी,
जिसे पढ़ते ही,
चेहरे फूलों की तरह
खिल जाया करती थी,
एक एक शब्दों से,
अपनेपन की खुशबू आती थी,
डाकिया के जाने के बाद,
लिफाफा खुलते ही,
भैया भाभी,राजू मुन्नू, सबके सब,
पूरे परिवार के लोग
पास पास ऐसे चले आते थे
जैसे,सारे के सारे कण
चुंबक से चिपक जाते हैं,
" अत्रकुशलम् -तथास्तु"
ये शब्द
स्नेहामृत से नहायी हुई
एक ऐसी डोर हुआ करती थी,
जो , यहां और वहां की
होंठों की मुस्कान, आंखों की नमी,
सांसों का गहरापन,
आशीष और दुआओं को
गंगा जमुना सरस्वती की पवित्र संगम
की तरह बांधकर रखती थी,
सादे कागज पर
नीली स्याही से लिखी गई पंक्तियां,
जिसके हर शब्द में छिपी मनोभाव
उभर आते थे,
पढ़ने और सुनने वालों के चेहरे
खिल जाया करते थे, जैसे
चांद को मुस्कराता देख
सितारे स्वभाव से ही
झिलमिलाने लगते हैं
बीते दिनों की हंसी- खुशी,
खोने - पाने, नींद -चैन,
कड़वे -मीठे,सारे पलों का
लेखा- जोखा हुआ करता था
उस,एक या दो पृष्ठ की, चिट्ठी में,
महिना बीत जाने के बाद
परिवार में,एक कौतुहलता,
एक तीव्र जिज्ञासा,एक इंतजार
फिर से,दस्तक दे जाया करते थे,
पड़ोसी के घर आया
डाकिया बाबू को देख,
रहा नहीं जाता था,
आखिर पूछ ही लिया करते थे,
कोई हमारी चिट्ठी आई क्या?
अब वो कौतुहलता,
हृदय की अनुभूतियां,
आंखों में भरी प्रतिक्षा की नमी,
परिवार में चिंता और सवाल,
अपनेपन के बधन की धृष्टता,
सारी की सारी,प्रीत- विव्हलता,
सिर्फ, स्मृतियों में शेष है।।
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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