चांदनी बनके उतरके नहा लूंगा जी भर
तुम्हारा मन तो एक झील है मेरे दिलबर।
झुकी झुकी पलकों से दीदार कभी मत करना,
जिंदा हो जाऊंगा मैं यूँ ही फिर से मर मरकर।
खुली खुली आंखों से ही सोये रहेंगे शब भर
कभी सपनों में नहीं आना सितारे बनकर।
जलाके दीप मेरे दिल में इक मुहब्बत का
चले न जाना कहीं दूर ओ मेरे हमनजर।
न जाने कब से ये मौसम बड़ा अजीब हुआ है,
लोग कहते हैं कि पागल सा हूँ आठो पहर।
यह रचना, रचनाकार के
सर्वाधिकार अधीन है
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The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







