Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

जन्माष्टमी : आत्मबोध

जन्माष्टमी : आत्मबोध का पर्व

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है। यह उस क्षण को स्मरण करने का पर्व है, जब अंधकार के बीच प्रकाश ने जन्म लिया था; जब भय के साम्राज्य में निर्भयता ने आँखें खोली थीं और जब अन्याय से दबे समाज को धर्म की पुनर्स्थापना का विश्वास मिला था। कृष्ण का जन्म इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि वे देवकी की कोख से जन्मे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने मनुष्य को उसके भीतर छिपे दिव्य प्रकाश का बोध कराया।
कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ। चारों ओर दीवारें थीं, पहरे थे, भय था और मृत्यु की छाया थी। किंतु उसी अंधकार में एक ऐसा प्रकाश प्रकट हुआ, जिसने युगों के अंधकार को चुनौती दी। यह दृश्य अपने आप में एक गहरा प्रतीक है। मनुष्य भी अनेक प्रकार के कारागारों में जीता है—भय का कारागार, मोह का कारागार, अहंकार का कारागार, लोभ का कारागार और सामाजिक दबावों का कारागार। कृष्ण-जन्म हमें संकेत देता है कि मुक्ति बाहर से नहीं, भीतर से आरंभ होती है।
इसीलिए जन्माष्टमी मूलतः आत्मबोध का पर्व है।
कृष्ण का जीवन किसी एक भूमिका में सीमित नहीं है। वे बालक हैं तो उनकी बाल-लीलाओं में सहजता है; मित्र हैं तो स्नेह और विश्वास है; सारथी हैं तो कर्तव्य का बोध है; योगेश्वर हैं तो जीवन का गहन दर्शन है। वे राजमहलों से लेकर गोकुल की गलियों तक सहजता से विचरण करते हैं। उनके व्यक्तित्व में जीवन के विरोधाभास एक साथ दिखाई देते हैं। वे बांसुरी बजाते हैं और युद्धभूमि में अर्जुन को कर्म का रहस्य भी समझाते हैं। वे प्रेम की भाषा जानते हैं और आवश्यकता पड़ने पर अधर्म के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व भी करते हैं।
कृष्ण हमें बताते हैं कि आध्यात्मिकता जीवन से पलायन नहीं है। जीवन के बीच रहकर, अपने दायित्वों को निभाते हुए और परिस्थितियों के दबाव में भी अपने विवेक को जीवित रखना ही सच्ची आध्यात्मिकता है।
आज जब मनुष्य के पास सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन भीतर का संतोष घटता जा रहा है, तब कृष्ण का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक हो उठता है। हम बाहरी उपलब्धियों की दौड़ में इतने व्यस्त हैं कि स्वयं से मिलने का अवसर ही नहीं निकाल पाते। हमारे पास दूसरों को देखने के लिए समय है, पर स्वयं को देखने के लिए नहीं। हम संसार को बदलना चाहते हैं, लेकिन अपने भीतर के द्वंद्व को पहचानने से बचते हैं।
कृष्ण का दर्शन इसी आत्म-विस्मृति को चुनौती देता है।
गीता में कृष्ण अर्जुन से युद्ध करने के लिए मात्र प्रेरित नहीं करते, बल्कि पहले उसके भीतर के भ्रम को दूर करते हैं। अर्जुन के हाथ में गांडीव है, सामर्थ्य है, अनुभव है, लेकिन उसका मन संशय से भरा है। कृष्ण पहले उसके मन का अंधकार दूर करते हैं और फिर कर्म का मार्ग दिखाते हैं। इसका अर्थ स्पष्ट है—सही कर्म के लिए सही दृष्टि आवश्यक है।
आज का मनुष्य भी अर्जुन की तरह अनेक कुरुक्षेत्रों के बीच खड़ा है। उसके सामने निर्णयों की कठिनाइयाँ हैं, संबंधों के संघर्ष हैं, महत्वाकांक्षाओं का दबाव है और भविष्य की अनिश्चितता है। ऐसे समय में कृष्ण की वाणी हमें सिखाती है कि परिस्थितियों से पहले अपने भीतर के भय और मोह पर विजय प्राप्त करनी होगी।
कृष्ण का एक बड़ा संदेश है—कर्म करते रहना। फल की चिंता से मुक्त होकर कर्म करना निष्क्रियता नहीं, बल्कि कर्म के प्रति पूर्ण समर्पण है। जब मनुष्य परिणाम के भय से मुक्त होकर अपना श्रेष्ठ कर्म करता है, तभी उसके भीतर स्वतंत्रता का जन्म होता है।
जन्माष्टमी का पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि धर्म केवल पूजा-पद्धति का नाम नहीं है। धर्म वह चेतना है जो हमें सही और गलत के बीच अंतर करने की शक्ति देती है। अन्याय देखकर मौन रहना, अपने स्वार्थ के लिए सत्य को दबा देना और सुविधा के लिए विवेक का त्याग कर देना—ये सब भीतर के अंधकार को बढ़ाते हैं।
कृष्ण का जीवन कहता है कि धर्म की रक्षा केवल शस्त्र से नहीं होती; सत्य, साहस, बुद्धि और संवेदना भी धर्म के उतने ही महत्वपूर्ण आयुध हैं।
कृष्ण की बांसुरी भी इसी दर्शन का एक सुंदर प्रतीक है। बांसुरी स्वयं में कुछ नहीं रखती। वह भीतर से रिक्त होती है, तभी किसी और की श्वास से संगीत उत्पन्न होता है। मनुष्य भी जब अपने अहंकार को थोड़ा खाली करता है, तभी उसके भीतर प्रेम, करुणा और सृजन का संगीत जन्म लेता है।
शायद कृष्ण की बांसुरी हमें यही सबसे सरल संदेश देती है—अपने भीतर इतना स्थान छोड़िए कि ईश्वर की धुन उसमें बज सके।
जन्माष्टमी की रात जब मंदिरों में घंटे बजते हैं, घरों में दीप जलते हैं और आधी रात को कृष्ण-जन्म का उत्सव मनाया जाता है, तब हमें केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक घटना का स्मरण नहीं करना चाहिए। हमें अपने भीतर भी यह प्रश्न उठाना चाहिए—क्या मेरे भीतर कृष्ण का जन्म हुआ है?
क्या मेरे भीतर सत्य के लिए साहस है?
क्या मेरे भीतर अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की शक्ति है?
क्या मैं अपने कर्म के प्रति ईमानदार हूँ?
क्या मेरे भीतर प्रेम है, लेकिन आसक्ति नहीं?
क्या मैं सफलता में विनम्र और असफलता में धैर्यवान रह सकता हूँ?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया आरंभ हो जाए, तो जन्माष्टमी वास्तव में सार्थक हो जाती है।
कृष्ण का जन्म हर वर्ष कैलेंडर में एक निश्चित तिथि पर होता है, लेकिन कृष्ण का जन्म हमारे भीतर किसी भी क्षण हो सकता है। जब अज्ञान के स्थान पर विवेक आता है, भय के स्थान पर साहस आता है, घृणा के स्थान पर प्रेम आता है और मोह के स्थान पर कर्तव्य-बोध जागता है—तभी हमारे भीतर कृष्ण का जन्म होता है।
इसलिए जन्माष्टमी को केवल व्रत, पूजा और उत्सव तक सीमित कर देना कृष्ण के विराट व्यक्तित्व को छोटा कर देना है। यह पर्व हमें अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है। यह पूछने का अवसर देता है कि जिस कृष्ण को हम मंदिर में खोज रहे हैं, क्या उनकी चेतना हमारे व्यवहार में भी दिखाई देती है
आज समाज को कृष्ण की मूर्तियों से अधिक कृष्ण के मूल्यों की आवश्यकता है। हमें ऐसी बुद्धि चाहिए जो संकट में मार्ग दिखाए, ऐसा साहस चाहिए जो अन्याय के सामने झुकने न दे, ऐसा प्रेम चाहिए जो विभाजन मिटाए और ऐसा कर्म चाहिए जो समाज के लिए उपयोगी हो।
कृष्ण जन्माष्टमी का वास्तविक उत्सव तब होगा, जब किसी एक व्यक्ति के भीतर निराशा की जगह आशा जन्म लेगी; जब कोई भयभीत व्यक्ति साहस जुटाएगा; जब कोई स्वार्थी व्यक्ति सेवा का अर्थ समझेगा और जब कोई भ्रमित मनुष्य अपने भीतर सत्य का प्रकाश खोज लेगा।
कृष्ण का जन्म अंधकार में हुआ था। शायद इसलिए वे हमें यह विश्वास देने आए थे कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश के जन्म को रोका नहीं जा सकता।
जन्माष्टमी इसी अविनाशी प्रकाश का पर्व है।और जब यह प्रकाश बाहर के मंदिरों से उतरकर हमारे भीतर के मंदिर में जलता है, तभी जन्माष्टमी केवल उत्सव नहीं रहती—वह आत्मबोध का पर्व बन जाती है।
-सिद्धार्थ गोरखपुरी




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