हास्य -व्यंग्य
चुनावी स्वार्थ और जनता
डॉ. एच सी विपिन कुमार जैन "विख्यात"
पाँच साल जो सोए थे, वो आज फिर से जागे हैं,
स्वार्थ के मारे नेता जी, गली-गली अब भागे हैं।
"तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हें स्वर्ग दिखाऊँगा,"
"तुम्हारी थाली में, मैं चांदी का चम्मच लाऊँगा।"
गरीब की कुटिया में भी, अब वो खाना खाते हैं,
स्वार्थ की खातिर वो, ज़मीन पर भी सो जाते हैं।
जैसे ही कुर्सी मिली, फिर वो पहचानते भी नहीं,
जनता की कराह को, वो जानते भी नहीं।
सफेद कुर्ते के नीचे, एक स्वार्थी दिल धड़कता है,
वोटों की गंध पाकर ही, उनका चेहरा दमकता है।
धर्म और जात के नाम पर, वो हमें लड़ाते हैं,
अपने स्वार्थ की रोटी, वो नफरत पर पकाते हैं।
वादों की पोटली में, बस झूठ का अंबार है,
नेताओं के लिए जनता, बस एक बड़ा बाज़ार है।
स्वार्थ सिद्ध होते ही, वो वीआईपी हो जाते हैं,
और हम जैसे लोग, बस धूल फाँकते रह जाते हैं।
लोकतंत्र के मंदिर में, ये स्वार्थ का पहरा है,
ये दाग इतना पुराना है कि, अब बहुत गहरा है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







