#नवगीत
भाव नहीं मेरे गीतों में
बिना तुम्हारे स्वर के.
लगते थे जो फूल सरीखे
हो गए अब पत्थर से....
जैसे कोई कोरा काग़ज़
बार-बार उलटाता
या फिर खोज रहा हो खुद को
और नज़र न आता।
टूटे राग सभी बिखरे हैं
रुके हुए उस स्वर के...
भाव नहीं मेरे गीतों में
बिना तुम्हारे स्वर के...
पलकों पर छुपकर बैठी है
बाँसुरियों की आस अभी,
तुम्हें सुनाने को है मन में
एक कहानी खास अभी,
शब्द अधूरे लगते मुझको
जैसे ग़ज़ल बहर के...
भाव नहीं मेरे गीतों में
बिना तुम्हारे स्वर के...
तुम जब गाओ, फूल गगन से
झरते हैं चुपचाप कहीं,
अलसी-सी दोपहरी बोले
साँझ हुई है आप यहीं?
तुम बिन तो रातें लगती हैं
सूनी किसी नगर के...
भाव नहीं मेरे गीतों में
बिना तुम्हारे स्वर के...
जब तुम पास नहीं होते हो
लगता है जग सूना
शब्द बिखर जाते हैं मेरे
बनता अज़ब नमूना
मन भी चुप,सुर भी संकोची
जैसे दीप अधर के...
भाव नहीं मेरे गीतों में
बिना तुम्हारे स्वर के...
चाँद जला है काग़ज़-सा ही
तेरी एक पुकार लिये,
तारों की लोरी अधूरी
तेरे मधुर विचार लिये,
छाँव भरी है पीपल-सी मैं
राही नयन डगर के...
भाव नहीं मेरे गीतों में
बिना तुम्हारे स्वर के...
पंकज के पांडेय
रोसड़ा, samstipur


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







