सोमनाथ की ज्योति से, मिटे मनस अँधियार।
मल्लिकार्जुन शरण में, कटते भवसंसार॥
महाकाल के नाम से, काँपे काल अपार।
ओंकारेश्वर ज्योति से, भीतर हो उजियार॥
केदारनाथ शरण जो गए, छूटा मन का भार।
भीमाशंकर कृपा से, मिटे सकल विकार॥
काशी विश्वनाथ जब, बसें हृदय के द्वार।
त्र्यंबकेश्वर ज्ञान दे, कटे अज्ञान अँधार॥
वैद्यनाथ हर पीर को, नागेश्वर भय हारे।
रामेश्वर में राम हैं, शिव ही जग रखवारे॥
घृष्णेश्वर की ज्योति कहे, छोड़ सकल अभिमान।
बारह ज्योति एक शिव, शिव ही परम विधान॥
मंदिर-मंदिर खोजता, मन का मंदिर भूल।
जिसमें शिव को खोजता, उसमें बैठा मूल॥
भस्म चढ़ाई देह पर, मन में लाख विकार।
मन निर्मल कर देख ले, शिव नहीं दूर अपार॥
न धन माँग, न मान माँग, न माँग जग से यश।
साँस-साँस शिव नाम ले, मिट जाए मन-क्लेश॥
मैं मिट जाए अंत में, मिट जाए हर भेद।
जहाँ न तू है, न मैं हूँ—वहीं शिव का अभिषेक॥
ज्योति बारह नाम की, ज्योति एक पहचान।
बाहर जितना खोजता, भीतर उतना जान॥
अंतिम साँस जो कह उठे—‘शिव ही मेरा सार।’
जनम-मरण दोनों मिटें, खुल जाए भव-पार॥
हर-हर महादेव!
ॐ नमः शिवाय॥
डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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