मेरे पिता ने मुझे
कभी यह नहीं कहा कि
“बेटी, किसी के सामने झुकना मत।”
उन्होंने कहा—
“झुकना पड़े तो झुक जाना,
पर ऐसी अकड़ मत पालना
जो तेरी अर्थी बन जाए।”
मैं चुप थी।
क्योंकि बचपन से
कहानियों में सुना था—
शेर बनो,
तूफ़ान बनो,
आग बनो।
पर पिता जीवन देख चुके थे।
उन्होंने देखा था कि
कब्रिस्तान में सोए हुए लोग
सभी बहादुर नहीं थे,
कुछ सिर्फ़ जिद्दी भी थे।
उन्होंने कहा—
“बेटी,
दुनिया में सबसे सस्ता सामान
सलाह है,
और सबसे महँगी चीज़
अपनी जान।”
लोग तुझे उकसाएँगे—
“दिखा दे उसे…”
“छोड़ना मत…”
“मार दे…”
मगर जब मुसीबत आएगी,
न वही लोग अस्पताल आएँगे,
न अदालत,
न श्मशान।
तब सिर्फ़ अपना बाप खड़ा मिलेगा,
टूटता हुआ।
फिर बोले—
“यदि कोई तुझे मार दे,
अपमानित कर दे,
धक्का दे दे,
तो पहले बचकर निकलना सीख।”
क्योंकि हर लड़ाई
लड़ने के लिए नहीं होती।
कुछ लड़ाइयाँ
सिर्फ़ बच जाने के लिए होती हैं।
मैंने पूछा—
“तो क्या भाग जाना चाहिए?”
पिता बोले—
“नहीं,
समझदारी और कायरता में फ़र्क होता है।”
शेर भी हर बार नहीं लड़ता,
साँप भी हर बार नहीं डसता।
जो हर चुनौती पर
जान दाँव पर लगा दे,
वह बहादुर कम,
मूर्ख ज़्यादा होता है।
फिर उन्होंने वह बात कही
जो उम्र भर याद रही—
“मैं तुझे जेल से निकाल सकता हूँ,
कर्ज़ लेकर वकील कर सकता हूँ,
तेरी गलतियों के साथ खड़ा रह सकता हूँ।
पर मौत…
मौत के बाद
मैं कुछ नहीं कर सकता।”
उनकी आवाज़ पहली बार काँपी थी।
उस दिन मैंने
एक पिता का प्रेम देखा।
वह प्रेम जो कहता है—
“मुझे तेरी जीत नहीं चाहिए,
मुझे तू चाहिए।”
क्योंकि सच यह है—
दुनिया बहादुरों की कहानियाँ सुनाती है,
पर हर कब्र के पीछे
एक माँ रोती है,
एक बाप टूटता है,
एक घर उजड़ता है।
इसलिए मेरे पिता ने कहा—
“बेटी,
जहाँ इज़्ज़त बचाकर निकल सको,
निकल आना।
जहाँ बात से काम चल जाए,
हाथ मत उठाना।
और जहाँ लड़ना ही पड़े,
वहाँ जीतने के लिए लड़ना,
मरने के लिए नहीं।”
क्योंकि जीवन का सबसे बड़ा साहस
मर जाना नहीं,
सही-सलामत घर लौट आना है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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